नेतृत्व जो जनजातियों को नहीं मिला- रामचंद्र गुहा

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published Published on Oct 31, 2019   modified Modified on Oct 31, 2019
भारतीय संविधान ने दो सामाजिक समूहों को विशेष रूप से वंचित माना है। पहला, अनुसूचित जाति, जिसे बोलचाल की भाषा में दलित कहा जाता है, जबकि दूसरा समूह है अनुसूचित जनजाति, जिसे अमूमन आदिवासी माना जाता है। दोनों समूह अपनी रचना में असाधारण रूप से एक-दूसरे के विपरीत हैं। भाषा, जाति, गोत्र, धर्म और आजीविका जैसे तमाम मामलों में पूरी तरह से जुदा। आंध्र प्रदेश की मडिगा जाति और उत्तर प्रदेश की जाटव जाति में कोई समानता नहीं, सिवाय इसके कि दोनों जातियों के लोग सरकारी नौकरी के लिए ‘अनुसूचित जाति' कोटे के तहत आवेदन कर सकते हैं। इसी तरह, तमिलनाडु के नीलगिरी पहाड़ियों की इरुला जनजाति और मध्य प्रदेश की महादेव पहाड़ियों की गोंड जनजाति भी एक समान नहीं हैं, सिवाय इसके कि दोनों जनजातियों के लोग सरकारी नौकरी के लिए ‘अनुसूचित जनजाति' कोटे के तहत आवेदन कर सकते हैं।

बावजूद इसके देश भर के दलित एक विलक्षण व्यक्तित्व के सम्मान में एकजुट दिखते हैं, और वह हैं भीमराव आंबेडकर। हालांकि अपने जीवनकाल में जिस बौद्धिक कौशल का उन्होंने परिचय दिया और सियासत में जिस तरह बड़े पद संभाले, उसकी वजह से महाराष्ट्र की अपनी महार (उप-जाति) में ही उनकी लोकप्रियता ज्यादा थी, मगर मृत्यु के बाद वह पूरे देश में दलितों के आदर्श बन गए। वहीं दूसरी तरफ, जनजातियों के पास ऐसा कोई नेता (जीवित या दिवंगत) नहीं है, जिसके पास आंबेडकर जैसा कद या सम्मान हो।

आंबेडकर की दलितों के बीच अनुकरणीय स्थिति का मैं लंबे समय से कायल रहा हूं। एकनाथ आवाड की आत्मकथा, जो कि मूलत: मराठी में लिखी गई है और जेरी पिंटो ने उसका बेहतरीन अंग्रेजी तर्जुमा किया है, मुझे फिर से उनकी यादों में खींच ले गई। आवाड का जन्म महाराष्ट्र के मराठवाड़ा क्षेत्र में बतौर मांग (मातंग) हुआ था। हालांकि बहुत छोटी उम्र से पढ़ने-लिखने की उत्कट इच्छा के कारण उनके परिजनों ने उन्हें ‘महाराचा औलाद' (महार का बेटा) कहना शुरू कर दिया था। हाई स्कूल छात्र के रूप में एकनाथ ने बहुत गंभीरता से आंबेडकर को पढ़ा, और साथ-साथ समाजवादी सांसद नाथ पाई (कभी बेशक वह प्रेरक व्यक्तित्व रहे, मगर अब भुला दिए गए) के भाषणों में भी उत्सुकता दिखाई। 1970 के दशक में किशोरावस्था में एकनाथ दलित पैंथर्स से प्रभावित हुए और मराठवाड़ा विश्वविद्यालय का नाम आंबेडकर के नाम पर रखे जाने की मांग को लेकर चले आंदोलन में शामिल हुए। इस आंदोलन के बारे में उन्होंने लिखा है, ‘यदि नाम बदलने का समर्थन करता कोई मोर्चा एक दिन निकलता, तो ठीक उसके अगले दिन इसके विरोध में दूसरा मोर्चा निकलता। इस कारण से तब मोर्चों की शृंखला शुरू हो गई थी। शिव सेना नाम बदलने के खिलाफ थी। उन दिनों छात्र, शिक्षक, वकील, डॉक्टर, ग्रामीण आदि सभी पक्ष या फिर विपक्ष में थे।'

नाम बदलने के इस आंदोलन ने उच्च जातियों को बर्बर प्रतिशोध के लिए उत्तेजित कर दिया। आवाड याद करते हैं, ‘महारों के घरों में जमकर आगजनी की गई... मराठवाड़ा में करीब 180 गांव ऐसी हिंसा के गवाह बने। दस दिनों तक दंगे भड़कते रहे। 18 जगहों पर पुलिस को गोलियां चलानी पड़ीं। एक हजार से ज्यादा दलित घरों को आग के हवाले कर दिया गया।' उस समय कॉलेज छात्र के रूप में आवाड इस संघर्ष से बुरी तरह प्रभावित हुए। वह लिखते हैं, ‘जैसे ही दलितों के विरुद्ध हिंसा की खबरें आईं, मैं बेचैन होने लगा। मन गुस्से से भर गया।'

गरीबी और जातिगत भेदभाव के खिलाफ अपने शुरुआती संघर्षों के बारे में उन्होंने लिखा है, ‘अभाव का कष्ट आपको खुशी नहीं देता। अपमान सह लेने और अपने जीवन की बेकदरी से आप खुशहाल जीवन नहीं जी सकते। मगर जब इंसान परिस्थितियों से जंग शुरू करता है और अन्याय के खिलाफ मुखर होता है, तब जिंदगी उसे अलग जिंदादिली का एहसास कराती है। मेरा अनुभव है कि संघर्ष एक निकास-द्वार बनाता है, जिससे आपका रोष और गुस्सा बाहर निकलता है।' आवाड की मानें, तो 1970 और 1980 के दशकों में ‘शिव सेना और कांग्रेस, दोनों का दलितों के प्रति विषाक्त रवैया था। शिव सेना बेशक मुंबई की ऐसी पार्टी मानी गई, जो मराठी लोगों के अधिकारों के लिए लड़ रही है, पर गांवों में तो वह उच्च-जाति की पार्टी थी, जो हिंदू जातिवाद के कड़वे स्वाभिमान को जगाए हुए थी।'

सामाजिक-कार्य में बीए और फिर मास्टर की डिग्री हासिल करने के बाद एकनाथ ने एक सवर्ण आदर्श जोड़े के साथ काम करना शुरू किया। उनकी समाजवादी सोच ने एकनाथ को आदिवासियों के साथ काम करने को प्रेरित किया। अपने अनुभवों के आधार पर आवाड ने आदिवासियों और दलितों के बीच एक उल्लेखनीय फर्क बताया है। वह लिखते हैं, ‘आदिवासी ज्यादा तकलीफ झेल सकते हैं, जबकि दलित ज्यादा संघर्ष कर सकते हैं।' उन्होंने लिखा है, ‘किसी भी सामाजिक आंदोलन या क्रांति में वे (आदिवासी) किसी समूह या नेता के अनुयायी के रूप में शामिल होते हैं। उनका अपना कोई नेता नहीं रहा है। आज भी आदिवासियों में बहुत कम नेता हैं'।

बतौर एक्टिविस्ट जब उन्होंने अपना करियर शुरू किया, तो लिखा है, ‘चूंकि मैं मातंग जाति में पैदा हुआ था, इसलिए मुख्य दलित पार्टियां मुझसे सौतेला व्यवहार करती थीं। यह ऐसा था, मानो सिर्फ एक जाति का ही बाबा साहेब के नाम पर हक हो। मुझे यह सही नहीं लगा कि हमने बाबा साहेब के विचारों को जाति के बंधन में बांध दिया है।' नतीजतन, आवाड आंबेडकर की उपलब्धियों को व्यापक मान्यता दिलाने में जुट गए। कई उच्च जातियों के अलावा मातंग और महार जैसी जातियों के लिए उन्हें आदर्श प्रतीक बनाने में आवाड ने अहम भूमिका निभाई।

आज बी आर आंबेडकर को गुजरे छह दशक से अधिक हो गए हैं। फिर भी, वह पूरे भारत में दलितों को शिक्षित करने, संगठित करने और भेदभाव के खिलाफ आंदोलन करने के लिए प्रेरित करते हैं। इससे भी उल्लेखनीय शायद यह है कि आंबेडकर का नाम उच्च जातियों में भी सम्मान से लिया जाता है। यह सम्मान उन्हें आप बेशक अनिच्छा से दें, लेकिन इसे कतई नकार नहीं सकते। दुर्भाग्य से, आदिवासियों के पास ऐसा कोई नेता नहीं, जो उन्हें आत्म सम्मान और अपनी गरिमा के लिए संघर्ष करने को आंबेडकर जैसा प्रेरित कर सके।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)


https://www.livehindustan.com/blog/story-hindustan-opinion-column-30th-oct-2019-2822960.html


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