प्रेमचंद 140 : जीवन के प्रति दहकती आस्था

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published Published on Aug 7, 2020   modified Modified on Aug 7, 2020

-सत्यहिंदी,

प्रेमचंद को लेकर साहित्यवालों में कई बार दुविधा देखी जाती है। उनका साहित्य प्रासंगिक तो है लेकिन क्यों? क्या ‘गोदान’ इसलिए प्रासंगिक है कि भारत में अब तक किसान आत्महत्या कर रहे हैं? या दलितों पर अत्याचार अभी भी जारी है, इसलिए ‘सद्गति’ और ‘ठाकुर का कुआँ’ प्रासंगिक है? क्या ‘रंगभूमि’ इसलिए पढ़ने योग्य बनी हुई है कि किसानों की ज़मीन कारखाने बनाने के लिए या ‘विकास’ के लिए अभी भी जबरन ली जा रही है? इस तरह प्रेमचंद को पढ़ने की आदत-सी बन गई है।

 पढ़ने का अभ्यास
प्रेमचंद को पढ़ने का या साहित्य मात्र पढ़ने का यह अभ्यास कथाकार को सामाजिक विचारक में शेष करके देखने के तरीक़े से जुड़ा हुआ है। इसीलिए ‘प्रेमचंद’ पर अब तक साहित्य की कक्षाओं में यह बहस चलती रहती है कि वे गाँधीवाद से मार्क्सवाद की ओर गए या आदर्शवाद से यथार्थवाद की ओर गए, आदि, आदि। क्या वे सुधार से क्रान्ति की ओर बढ़े? क्या उनके विचारों में विकास ऊर्ध्व दिशा में हुआ? इस प्रकार के प्रश्न आज भी किए जाते हैं। कुछ लोग मानते हैं कि 1936 में प्रगतिशील लेखक सम्मेलन में दिए गए उनके व्याख्यान में उनके विचारों का परिपाक दिखलाई पड़ता है। लेकिन अज्ञेय प्रेमचंद पर अपने निबंध ‘उपन्यास-सम्राट’ में इस प्रसंग में एक ऐसी सूचना देते हैं जिसे प्रमाणित करने या ग़लत साबित करने का कोई तरीक़ा हमारे पास नहीं है। वह लिखते हैं, 

“...कभी-कभी यह चिंता उन्हें ग्रस लेती थी कि उनके राजनीतिक विचारों के कारण उनका इस्तेमाल किया जा रहा है। ऐसा राजनीतिक इस्तेमाल भी शोषण ही है और इसकी प्रतिक्रिया ऐसे व्यक्ति में स्वाभाविक थी जिसका सारा मानवतावादी आग्रह मनुष्य वर्ग अथवा समाज के द्वारा मनुष्य के दोहन के विरूद्ध था। लाहौर में आर्य समाज के सम्मेलन में निमंत्रित होकर वहाँ पढ़ने के लिए जो अभिभाषण उन्होंने तैयार किया था, सम्मेलन  में पहुँचकर उन्होंने उसे जेब से निकाला ही नहीं और एक दूसरा ही भाषण वहाँ दिया। तब भी उन्हें यही अहसास था कि अपने जो विचार वह लिख कर लाए हैं उन्हें उस रूप में प्रस्तुत करना उनका दुरूपयोग हो जाने देना होगा। ऐसा ही भाव, लेकिन कुछ और सघन रूप में, उनके मन में लखनऊ के प्रगतिशील लेखक सम्मेलन  के अवसर पर उठा था, जिसके लिए एक अध्यक्षीय भाषण उन्होंने लिखकर तैयार किया था। वह भाषण भी उन्होंने वहाँ पढ़ा नहीं; एक स्वतंत्र और प्रत्युत्पन्न भाषण ही उन्होंने दिया। अर्थात् जो भाषण उस ‘सम्मेलन का अध्यक्षीय भाषण’ माना जाता है वह वास्तव में उन्होंने कभी दिया नहीं। ...लिखा ज़रूर था; शायद उनमें अनंतर कुछ परिवर्तन भी किए थे।”

प्रेमचंद ख़ुद कथा या उपन्यास का काम समझते थे मनुष्य के मनोभावों को समझना और उनका चित्रण करना। यह ठीक है कि लेखक विचारों के बिना काम नहीं कर सकता, लेकिन वह किसी विचार प्रणाली का प्रवक्ता नहीं है। इस रूप में बात करने से भी कोई लाभ नहीं कि प्रेमचंद में अंतर्विरोध हैं। उनके रहते हुए प्रेमचंद के पक्ष में तर्क यह दिया जाता है कि उनके अंतर्विरोध उनके युग के अंतर्विरोध हैं। लेकिन यह तर्क बहुत लचर है। जब ख़ुद प्रेमचंद यह कहते हैं कि साहित्य राजनीति के आगे चलनेवाली मशाल है तो वह अपने युग के अंतर्विरोधों से सीमित कैसे हो सकता है? इस वाक्य का ठीक ठीक अर्थ क्या है? एक अर्थ तो यह हो सकता है कि राजनीति नैतिक मामलों में रणनीतिक हो सकती है, लेकिन साहित्य ऐसा नहीं कर सकता। राजनीति मनुष्यता के दायरे को संकुचित कर सकती है, मानवीय संवेदना के दायरे को छोटा करके ही वह शायद अधिक सफल हो सकती है क्योंकि उसे अपने जनाधार स्पष्ट रखना होता है, लेकिन वह साहित्य का क्षेत्र नहीं है।

पूरा लेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें. 


अपूर्वानंद, https://www.satyahindi.com/literature/140-years-of-premchand-part-11-premchand-faith-in-life-112299.html


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