बच्चे पास हो गए, नीति फेल हो गई-- हरिवंश चतुर्वेदी

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published Published on Jul 23, 2018   modified Modified on Jul 23, 2018
अब फिर से पांचवीं और आठवीं कक्षाओं में फेल होने वाले बच्चों को रोका जा सकेगा। शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2010 का यह मुख्य प्रावधान था कि आठवीं कक्षा तक बच्चों को फेल नहीं किया जाएगा। लोकसभा ने इसके लिए अधिनियम में संशोधन कर दिया है। मानव संसाधन मंत्री प्रकाश जावड़ेकर का कहना था कि बच्चों को फेल न करने की नीति से स्कूली शिक्षा व्यवस्था चरमरा रही थी और अनेक राज्य सरकारों ने इस नीति को वापस लेने की मांग की थी। सरकार का मानना है कि इस संशोधन के बाद प्रारंभिक शिक्षा व्यवस्था में फिर से जवाबदेही पैदा की जा सकेगी।

फेल होने वाले बच्चों को अगली कक्षा में जाने से रोका जाना हमारी स्कूली शिक्षा की एक बड़ी दुविधा का प्रतीक है। शिक्षा का अधिकार कानून की यह एक मौलिक सोच थी कि यदि हम देश के हर बच्चे को छह से 14 वर्ष की आयु में प्रारंभिक शिक्षा पाने का अधिकार देते हैं, तो उन्हें खराब रिजल्ट के लिए फेल न करके निरंतर मूल्यांकन के जरिए लगातार सुधारने की कोशिश करनी चाहिए। संविधान में दिए गए निर्देशक सिद्धांतों में यह जिम्मेदारी केंद्र सरकार व राज्य सरकारों को दी गई थी कि वे 14 वर्ष तक के सभी बच्चों को प्रारंभिक शिक्षा देना सुनिश्चित करें। शिक्षा का अधिकार अधिनियम के पीछे यही भावना थी कि बच्चों को फेल करने की बजाय स्कूली शिक्षा व्यवस्था को जवाबदेह बनाया जाए।

नया कानून बनने के दो वर्षों के बाद ही बच्चों को आठवीं कक्षा तक फेल न करने की नीति का विरोध शुरू हो गया था। 2012 में यूपीए-2 के कार्यकाल में हुई सेंट्रल एडवाइजरी बोर्ड फॉर एजुकेशन (सीएबीई) की बैठक में राज्य सरकारों के प्रतिनिधियों ने फेल न करने की नीति का जमकर विरोध किया था। उनका कहना था कि नौवीं और दसवीं कक्षाओं के परीक्षा फल में होने वाली गिरावट का कारण आठवीं तक फेल न करने की नीति है, जो स्कूली शिक्षा के लिए अभिशाप बन गई है।

उसी बैठक में हरियाणा की तत्कालीन शिक्षा मंत्री गीता भुक्कल की अध्यक्षता में इस नीति पर विचार के लिए एक उपसमिति का गठन किया गया। गीता भुक्कल समिति ने 2014 में पेश अपनी रिपोर्ट में यह सिफारिश की थी कि बच्चों को आठवीं तक फेल न करने की नीति को क्रमिक रूप में वापस लिया जाए। समिति का कहना था कि बच्चों को फेल न करने की नीति ने पढ़ाई के लिए बच्चों और उनके शिक्षकों की प्रेरणा को खत्म कर दिया है और अब वे मेहनत करने से बच रहे हैं। समिति ने यह माना कि एक आदर्श वातावरण में ही यह नीति सफल हो सकती थी। मानव संसाधन मंत्रालय ने समिति की रिपोर्ट को लागू करने से पहले फिर एक बार 2015 में राज्य सरकारों से उनकी राय पूछी। जिन 22 राज्यों ने इस सवाल पर अपनी राय भेजी, उनमें से 18 इसे वापस लेने के पक्ष में थे।

साल 2010 में अधिनियम के लागू होने के पांच वर्ष बाद 2015 में जब नौवीं और 10वीं के नतीजों की समीक्षा की गई, तो पाया गया कि इन कक्षाओं में फेल होने वाले बच्चों की तादाद पहले से ज्यादा हो गई है। कारणों की पड़ताल में यह मालूम हुआ कि बच्चों में फेल होने का डर खत्म हो गया था, शिक्षकों में भी बच्चों के प्रति जिम्मेदारी की भावना खत्म हो गई थी, बच्चे नियमित रूप से स्कूल नहीं जाते थे। वे हर साल बिना मेहनत किए अगली कक्षा में पहुंच जाते थे, तो मां-बाप भी यही समझते रहे कि उनका बच्चा पढ़ रहा होगा। उन्हें झटका तब लगता था, जब वह नौवीं कक्षा में फेल हो जाता था।

वास्तव में, आठवीं कक्षा तक बच्चों को फेल न करने का प्रावधान एक प्रगतिशील कल्पना थी, जो यह मानती थी कि ‘कोई भी बच्चा कभी फेल नहीं होता, बल्कि स्कूली व्यवस्था उसको शिक्षित करने में नाकामयाब होती है।' पर स्कूली शिक्षा में बड़े सुधार सिर्फ प्रगतिशील विचारों और कल्पना मात्र से नहीं होते। क्या आज यह सवाल नहीं पूछा जाना चाहिए कि 2010 में कानून बनाने के बाद स्कूली व्यवस्था में आमूल-चूल बदलाव के लिए केंद्र और राज्य सरकारों ने क्या किया? बजटरी व्यवस्था, पाठ्यक्रम, पढ़ाने के तौर-तरीकों, शिक्षकों व बुनियादी सुविधाओं के समुचित प्रबंधन के लिए क्या हम कुछ कर पाए?

नई शिक्षा नीति के लिए गठित कस्तूरीरंगन कमेटी की रिपोर्ट जुलाई, 2018 में प्रस्तुत की जानी थी, किंतु उसे फिलहाल टाल दिया गया है। नई शिक्षा नीति बनाने के लिए अक्तूबर, 2015 में गठित टीएसआर सुब्रहमण्यम कमेटी ने आठवीं कक्षा तक बच्चों को फेल न करने के प्रावधान पर पूरे देश के शिक्षाविदों से बातचीत की और उन्हें अपनी राय बताई। इस कमेटी ने अप्रैल, 2016 में प्रस्तुत रिपोर्ट में कहा कि बच्चों को प्राथमिक शिक्षा के स्तर पर फेल न करने की नीति कक्षा पांच तक जारी रहनी चाहिए। कमेटी का कहना था कि 11 वर्ष तक आयु के बच्चों को फेल होने की यंत्रणा से मुक्त रखा जाए, पर कक्षा छह के बाद यह सुविधा नहीं होनी चाहिए।

अधिनियम में संशोधन के बाद अब इस बात पर बहस होनी चाहिए कि संविधान में छह से 14 वर्ष की आयु के सभी बच्चों को अनिवार्य प्रारंभिक शिक्षा देने की गारंटी को देश अभी तक क्यों पूरा नहीं कर पाया? क्यों आज भी इस आयु वर्ग के तीन करोड़ बच्चे प्रारंभिक शिक्षा से वंचित हैं? लाखों सरकारी और निजी स्कूलों में आज भी बुनियादी सुविधाएं, जैसे भवन, फर्नीचर, शिक्षक, शौचालय, किताबें आदि उपलब्ध नहीं हैं। क्या प्रस्तावित नई शिक्षा नीति में इसके लिए समुचित वित्तीय संसाधन की व्यवस्था की जाएगी? क्या स्कूली शिक्षकों की भर्ती, शिक्षा और प्रशिक्षण के बारे में कोई मौलिक विचार दिया जाएगा?

(ये लेखक के अपने विचार हैं)


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