बजट में दीर्घकालिक विकास के लिए रणनीति नहीं दिखाई देती- एम के वेणु

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published Published on Jul 8, 2019   modified Modified on Jul 8, 2019
नरेंद्र मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल का पहला बजट न्यू इंडिया में कतार के आखिरी व्यक्ति के सशक्तीकरण की बातें तो खूब करता है, लेकिन यह इस सवाल का कोई जवाब नहीं देता है कि आखिर निवेश और उपभोग के दोहरे इंजन से चलने वाली विकास की गाड़ी में धक्का में लगाए बिना एक पूरी तरह वित्त पोषित कल्याणकारी राज्य को कैसे चलाया जाएगा?

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बातें तो अच्छी और सही कीं, जिनमें आखिरी व्यक्ति तक कल्याणकारी योजनाओं का लाभ पहुंचाने के मोदी के वादों की झलक दिखाई देती है, लेकिन सुस्त पड़ती वैश्विक अर्थव्यवस्था और कुछ समय से भारत के विनिर्माण और कृषि उत्पादन में आ रही गिरावट के साए में आर्थिक विकास को रफ्तार देने की कोई सुसंगत रणनीति इसमें नहीं दिखाई दी.

बजट में राजस्व का जो हिसाब लगाया गया है, वह इतना कमजोर है कि पहली बार वित्त मंत्रालय ने रिज़र्व बैंक के बहीखाते से मिले 90,000 करोड़ को ‘अधिशेष' (सरप्लस) के तौर पर दिखाया है.

बिमल जालान समिति द्वारा अपनी सिफारिशों को सार्वजनिक किए जाने से पहले ही ऐसा किया जाना रोजगार निर्माण को ध्यान में रखकर भौतिक और सामाजिक बुनियादी ढांचे के क्षेत्र में बड़े निवेश के वास्ते फंड का इंतजाम करने की व्यग्रता को दिखाता है.

सरकार द्वारा बुनियादी ढांचे के क्षेत्र में निवेश के लिए पैसे का इंतजाम करने के लिए डॉलर में अंकित बॉन्ड्स के रास्ते से संप्रभु ऋण का इंतजाम करने की कोशिश भी एक और खतरनाक रणनीति हो सकती है. भारत के राजकोषीय घाटे के आंशिक डॉलरीकरण के पक्ष में वित्तमंत्री का तर्क है कि भारत का कुल विदेशी कर्ज जीडीपी के 5% से नीचे है, जिसे सुरक्षित सीमा के भीतर कहा जा सकता है.

द वायर हिन्दी पर प्रकाशित इस कथा को विस्तार से पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें 


http://thewirehindi.com/87371/budget-2019-lacks-a-coherent-vision-for-long-term-growth/


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