बिहार की ज्योति पासवान: एक मकान, आठ साइकिलें, लेकिन अब पहले जैसी भीड़ नहीं

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published Published on Oct 18, 2020   modified Modified on Oct 18, 2020

-बीबीसी, 

वो ज़्यादा नहीं बोलती. बोले भी तो कैसे? जब भी कोई पत्रकार, उनकी अविश्वसनीय कहानी के बारे में पता करने के लिए पहुँचता है, उनके पिता आसपास ही मौजूद रहते हैं.

आने वालों से ज़्यादातर उनके पिता ही बात करते हैं. वो ख़ुद ज़्यादा कुछ नहीं बोलतीं और कई बार तो वो बातचीत के बीच में ही अचानक उठ कर चल देती हैं.

लेकिन, आज वो दुबली-पतली लड़की एक सेलिब्रिटी है. लोग उन्हें 'साइकिल गर्ल' कहते हैं.

बतियाते हुए कभी-कभार वो मुस्कुरा देती हैं. और फिर वो वही जुमला दोहरा देती हैं, जो उन्होंने मिलने आने वाले लगभग सभी लोगों को बोला होगा. लड़की का नाम है ज्योति पासवान है.

15 बरस की ये लड़की तब सुर्ख़ियों में आई थी, जब वो लगभग 1200 किलोमीटर साइकिल चला कर, गुरुग्राम से बिहार के अपने पुश्तैनी गाँव पहुँची थी. ज्योति का गाँव बिहार के दरंभगा ज़िले में है.

ये बात इस साल के मई महीने की है, जब पूरे देश में लॉकडाउन लगा हुआ था. अपने गाँव से शहर जाकर काम कर रहे मज़दूरों पर संकट छाया हुआ था. लॉकडाउन के दौरान शहरों में फँसे बड़ी संख्या में मज़दूर पैदल चल कर, साइकिल से या फिर गाड़ियों से लिफ़्ट लेकर अपने गाँव पहुँच रहे थे.

मार्च महीने में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कोरोना वायरस का संक्रमण फैलने से रोकने के लिए अचानक पूरे देश में लॉकडाउन लगाने की घोषणा की थी.

इसी दौरान ज्योति पासवान अपने बीमार पिता मोहन पासवान को साइकिल पर बैठा कर गाँव ले आईं थीं. उसके बाद से ही, ज्योति के घर पर उनसे मिलने आने वालों का तांता लग गया था.

बिहार के दरभंगा ज़िले के सिंघवारा ब्लॉक में पड़ता है सिरहुल्ली गाँव. मोहन पासवान अब इस गाँव के बहुत ख़ास आदमी हैं. इसकी वजह उनकी बेटी ज्योति पासवान हैं.

लौटने के सिवा कोई चारा नहीं था
मोहन पासवान के घर पर लोगों का तांता लग गया था. न जाने कौन-कौन से लोग उनके घर आए थे. वो ज्योति से मिलना चाहते थे. उसे तोहफ़े देते थे. तमाम तरह के प्रस्ताव आ रहे थे. कोई अपने प्रोडक्ट बेचने के लिए ज्योति को ब्रांड एम्बैसडर बनाना चाहता था, तो कोई कुछ और प्रस्ताव लेकर आया था.

दरअसल अपने बीमार पिता को साइकिल पर बैठा कर गुरुग्राम से अपने गाँव पहुँचने की ज्योति पासवान की कहानी एक त्रासदी है. भले ही इसे साहसिक क़दम बता कर आज इसका जश्न मनाया जा रहा हो. हालांकि, ये अपने आप में साहसिक क़दम भी है.

लेकिन असली साहस तो वो था कि उन्होंने ऐसा करने का फ़ैसला किया. अगर रास्ते में क़िस्मत ने साथ दिया तो बहुत बेहतर और अगर नियति पूरे सफ़र के दौरान रूठी रही, तो वो भी उनके फ़ैसले का ही हिस्सा था. लेकिन, असली बहादुरी इसी बात में थी कि ज्योति पासवान ने उस मुश्किल वक़्त में साइकिल से गाँव तक का सफ़र तय करने का फ़ैसला किया.

लेकिन ज्योति को गाँव क्यों वापिस आना पड़ा?

हाई टेक शहर गुरुग्राम में एक झोपड़ी में बसर करने वाली ज्योति के सामने अचानक बड़ी चुनौती खड़ी हो गई थी.

अचानक तालाबंदी हो जाने से इतने बड़े शहर में उनके पास गुज़ारा करने का कोई ज़रिया ही नहीं था. सब कुछ अचानक बंद हो गया. काम का कोई ठिकाना नहीं बचा. ज्योति के पिता बीमार थे और अब बाप-बेटी के पास एक ही चारा बचा था. किसी न किसी तरह अपने गाँव पहुँचा जाए.

लॉकडाउन के चलते न तो ट्रेनें चल रही थी और न ही बसें. तो, बहुत से आप्रवासी मज़दूरों ने तय किया कि वो पैदल या साइकिल से यूपी, बिहार, ओडिशा और पश्चिम बंगाल के अपने गाँवों तक जाएँगे. ये वो सूबे हैं, जहाँ से काम की तलाश में बड़े पैमाने पर लोग शहरों की ओर जाते हैं.

केंद्रीय श्रम और रोज़गार मंत्रालय के आँकड़े कहते हैं कि लॉकडाउन के दौरान 32 लाख से ज़्यादा आप्रवासी कामगार शहरों से उत्तर प्रदेश लौटे थे. वहीं, बिहार वापस आने वाले मज़दूरों की संख्या 15 लाख के आसपास थी.

अगर आप ज्योति के गाँव सिरहुल्ली पहुँचें, तो सड़क से ही उनका घर दिख जाता है. ये गाँव के बाक़ी मकानों से काफ़ी ऊँचा है. तीन मंज़िल का ये मकान, ज्योति और उनके पिता के गाँव लौटने के बाद तीन महीने में बन कर तैयार हुआ था.

अभी भी इस पर रंग-रोगन नहीं हुआ है. लेकिन, घर में एक टॉयलेट बना है. बिहार के इस ग्रामीण क्षेत्र में घर में शौचालय होना बड़ी बात है. घर का बरामदा सामने की सँकरी गली में निकला हुआ है. बरामदे में प्लास्टिक की कुर्सियाँ पड़ी हैं, जिन्हें हाल ही में ख़रीदा गया है.

सिरहुल्ली का भी वही हाल है, जो आपको बिहार के किसी और गाँव में देखने को मिलेगा. ये गाँव भी जात-बिरादरी के हिसाब से टोलों-मोहल्लों में बँटा हुआ है. ऐसे में किसी दलित लड़की को अचानक मिली शोहरत और दौलत को पचा पाना गाँव के बहुत से लोगों के लिए मुश्किल है.

जुलाई महीने में 14 बरस की एक लड़की से बलात्कार के बाद उसकी हत्या की ख़बर ने सुर्ख़ियां बटोरी थीं. वो भी दरभंगा ज़िले की ही रहने वाली थी. इस दलित लड़की को एक बाग़ से आम चुराने की सज़ा दी गई थी. ये ख़बर वायरल हो गई थी.

पेशे से ड्राइवर, प्रेम प्रकाश कहते हैं, "मुझे लगता है कि असल में ये दलितों को दी गई एक वार्निंग थी. ये बताने की कोशिश की गई कि अपनी औक़ात से ज़्यादा मत उछलो. ये बिहार है बाबू. जात ही यहाँ की हक़ीक़त है."

अब एक सेलेब्रिटी हैं, ज्योति
लेकिन ज्योति अपनी उपलब्धि को लेकर बिंदास है, उन्हें कोई संकोच नहीं है. वो जींस और शर्ट पहनती हैं. स्थानीय मीडिया की ख़बरों की मानें, तो ज्योति ने अपनी बुआ की शादी का ख़र्च भी उठाया है. किसी भी आम दिन आप सिरहुल्ली पहुँचें, तो आप उन्हें गाँव की सड़क पर बेतकल्लुफ़ी से साइकिल चलाते देख सकते हैं.

लोग उन्हें जानते हैं. उनके बारे में सबने सुन रखा है. अब ज्योति की ज़िंदगी बिल्कुल अलग है.

पूरी रपट पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें. 


चिंकी सिन्हा, https://www.bbc.com/hindi/india-54584143


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