Resource centre on India's rural distress
 
 

कृषि पैकेज, मार्केटिंग रिफॉर्म्स और राजनीति के पेच

-आउटलुक,

“प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 12 मई को राष्ट्र को संबोधन में देश की अर्थव्यवस्था को कोविड-19 महामारी से उबारने के लिए 20 लाख करोड़ रुपये के भारी-भरकम राहत पैकेज की घोषणा के बाद से ही समाचार माध्यमों में लगातार बड़ी सुर्खियां बन रही हैं।”
इस पैकेज की विस्तृत जानकारी का जिम्मा उन्होंने वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण को दे दिया था और वह किस्तों में 20 लाख करोड़ रुपये के पैकेज का गणित देश के सामने रख रही हैं। वित्त मंत्री द्वारा 13 मई से पैकेज की घोषणाओं की श्रृंखला शुरू की गई, जिसमें उन्हें सबसे अधिक सुर्खियां और वाहवाही 15 मई की घोषणाओं के लिए मिली जिनमें उन्होंने कृषि क्षेत्र और किसानों पर फोकस किया था। वैसे हमें यह समझ लेना चाहिए कि कोविड-19 महामारी से किसानों को हुए नुकसान के लिए राहत को अलग देखना चाहिए और सरकार के फैसलों को अलग, क्योंकि सीधे वित्तीय राहत के नाम पर बहुत कुछ इसमें नहीं है। घोषणाओं में सबसे बड़ी दो बातें थी। पहली, एक लाख करोड़ रुपये का एग्रीकल्चर इंफ्रास्ट्रक्चर फंड बनाना और दूसरा, कृषि मार्केटिंग रिफार्म्स को लागू करने की घोषणा। कृषि उत्पादों की मार्केटिंग के लिए केंद्रीय कानून लाना और आवश्यक वस्तु अधिनियम में बड़े बदलाव की बात कही गई है। यहां यह कहना जरूरी है कि जो लोग समझ रहे हैं कि केंद्रीय कानून एग्रीकल्चर प्रॉड्यूस मार्केट कमेटी (एपीएमसी) एक्ट को समाप्त कर देगा, उनको अपने फैक्ट चैक कर लेने चाहिये क्योंकि यह राज्यों के अधिकार में है और उसका समाप्त होना लगभग असंभव है। दूसरे, आवश्यक वस्तु अधिनियम एक ऐसा कानून है जिसमें पिछले तीन दशकों से सुधार चल रहे हैं। इसलिए अब इस आगे कैसे बढ़ा जाएगा यह देखना काफी अहम होगा।

पहले बात उन मार्केटिंग सुधारों की जिनको क्रांतिकारी माना जा रहा है। केंद्र सरकार कृषि उत्पादों के अंतरराज्यीय (इंटर स्टेट) और राज्य के भीतर (इंट्रा स्टेट) मार्केटिंग में बदलाव के लिए एक केंद्रीय कानून लाएगी जो किसानों को प्रतिबंधों और व्यापार बाधाओं से मुक्त कर देगी। असल में इस सुधार को लेकर केंद्र सरकार बहुत गंभीर है और उसके चलते पिछले कुछ सप्ताहों के दौरान कृषि मंत्रालय, गृह मंत्रालय और प्रधानमंत्री कार्यालय में काफी मंथन हुआ। इस मैराथन मंथन के बाद ही नया कानून लाने की बात तय हुई। इसके पहले राज्यों को कहा गया कि वह एपीएमसी कानून में सुधार करें जिसे शुरू में किसी भी राज्य ने नहीं माना। लेकिन शुरुआती हीला-हवाली के बाद भाजपा शासित गुजरात और कर्नाटक ने इसमें सुधार की शुरुआत कर दी। सूत्रों के मुताबिक इसके पीछे काफी हद तक गृह मंत्रालय की भूमिका रही। अब बात करें नए प्रस्तावित कानून की। संविधान के सातवें शेड्यूल के तहत राज्यों के आयटम नंबर 14 के तहत कृषि राज्यों का विषय है, और राज्य के भीतर कृषि विपणन राज्यों के अधिकार क्षेत्र में है। इसलिए केंद्रीय कानून के बावजूद एपीएमसी के बरकरार रहने की पूरी संभावना है क्योंकि राज्य सरकारें और खासतौर से गैर-भाजपा सरकारें इस पर केंद्र के विरोध में आएंगी, यह लगभग तय है। हालांकि इस मुद्दे पर केंद्र सरकार काफी सोच-समझ कर आगे बढ़ रही है और इस कानून को लेकर लगातार विधि मंत्रालय से राय ली गई। केंद्र सरकार का मानना है कि कृषि जिन्सों की मार्केटिंग राज्यों का अधिकार है लेकिन ट्रेड में वह कानून लागू कर सकती है। अधिकारियों का मानना है कि कनकरंट लिस्ट की एंट्री 22 और 42 इसमें केंद्र के लिए सहायक हो सकती हैं। हालांकि शुरुआती चर्चा में विधि मंत्रालय की राय लिए बिना ही इस पर आगे बढ़ने की बात चली, लेकिन बाद में उसकी राय लेने का फैसला लिया गया। कुछ मुद्दों पर विधि मंत्रालय की राय बहुत स्पष्ट नहीं रही, हालांकि अंतरराज्यीय मार्केटिंग को लेकर केंद्र का अधिकार स्पष्ट है। साथ ही यह देखना होगा कि मार्केटिंग और ट्रेड की कैसे अलग-अलग व्याख्या की जाती है।

एक पक्ष यह भी है कि एपीएमसी का ज्युरिस्डिक्शन (कैचमेंट एरिया) मंडी की सीमा में ही है, इसके बाहर केंद्र का कानून काम कर सकता है। लेकिन एपीएमसी के तहत मंडी का मतलब केवल मंडी यार्ड की चारदीवारी नहीं होती, बल्कि एक भौगोलिक क्षेत्र होता है। इन सब मसलों को देखते हुए मुद्दा काफी पेचीदा है। इसलिए कानून के आने का इंतजार करना चाहिए। लेकिन यह तय है कि जब इस कानून पर बात आगे बढ़ेगी तो यह बड़ा राजनीतिक विवाद का मुद्दा बनेगा। वैसे कृषि जिन्सों के अंतरराज्यीय व्यापार को फ्री करना किसानों के लिए फायदेमंद साबित हो सकता है। वे भी ‘एक देश, एक बाजार’ के हकदार हैं क्योंकि उनके लिए राज्यों की सीमाएं कई बार अंतरराष्ट्रीय सीमाओं की तरह बाधाएं बनकर खड़ी हो जाती हैं, जो किसानों के शोषण का कारण बनती हैं।

अब बात दूसरे बड़े सुधार की, जिसमें आवश्यक वस्तु अधिनियम में संशोधन की बात कही गई है। यह बात सही है कि यह कानून उपलब्धता के संकट के दिनों के लिए बना था और अब ज्यादातर कृषि उत्पादों के मामले में आधिक्य की स्थिति है और उन्हें मांग व बाजार की दरकार है। वैसे इसमें बड़े सुधार एचडी देवगौड़ा और इंद्रकुमार गुजराल के नेतृत्व वाली संयुक्त मोर्चा सरकार के दौरान शुरू हुए थे और इसके दायरे से दर्जनों उत्पादों को बाहर कर दिया गया था। लेकिन कुछ माह पहले तक इसका उपयोग हुआ क्योंकि केंद्र सरकार महंगाई पर अंकुश के लिए स्टॉक लिमिट इसी कानून के तहत तय करती है। यही नहीं, कुछ माह पहले प्याज के दाम बढ़ जाने पर प्याज का भंडार रखने वाले किसानों और कारोबारियों पर आय कर के छापे भी डाले गए थे। इसके अधिकांश प्रावधानों को समाप्त करने की बात सरकार कह रही है। सरकारी सूत्रों के मुताबिक नरेंद्र मोदी के दूसरी बार सत्ता में आने के समय से ही इस पर मंथन चल रहा था। अब कोविड-19 संकट के समय इस पर फैसला लेने की घड़ी आई तो इसे संयोग ही कहा जा सकता है। वैसे सरकार अगर अपनी घोषणा के तहत कदम उठाती भी है तो यह देखना दिलचस्प होगा कि प्याज, आलू, तिलहन और दालों के मामले में वह इसे जरूरत पड़ने पर दोबारा लागू करने का लालच छोड़ पाती है या नहीं, क्योंकि ये ऐसे उत्पाद हैं जिनकी एक फसल कमजोर होने पर कीमतों में भारी तेजी की आशंका रहती है। ऐसे में महंगाई के लक्षित स्तर को बरकरार रखने के साथ ही राजनीतिक नुकसान से बचने के लिए इस कानून के प्रावधानों को लागू करने का मोह सरकार आसानी से नहीं छोड़ पाएगी। कृषि क्षेत्र के इन प्रस्तावित सुधारों को 1991 के आर्थिक सुधारों जैसा भी कहा जा रहा है, लेकिन यह तभी संभव है जब इसके सभी प्रावधान सफलतापूर्वक लागू किए जाएं।

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