कोविशील्ड के परीक्षण के दौरान स्वयंसेवकों में उपजी बीमारी से भारतीय नियमन पर उठते सवाल

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published Published on Jan 13, 2021   modified Modified on Jan 13, 2021

-द कारवां,

अक्टूबर 2020 में चेन्नई में एक 40 वर्षीय व्यक्ति जिन्होंने कोविशील्ड वैक्सीन के लिए नैदानिक ​​परीक्षण में भाग लिया था, अचानक बीमार पड़ गए. इस कोविड-19 वैक्सीन को सीरम इंस्टीट्यूट आफ इंडिया ने स्वीडिश-अमेरिकी कंपनी ऐस्ट्राजनेका और ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के साथ मिलकर तैयार किया है. डॉक्टर ने उन्हें बताया कि उन्हें एंसेफैलोपैथी है, जो मस्तिष्क संबंधी तंत्रिका का विकार है. चार दिनों तक वह कभी होश में आते और फिर बेहोश हो जाते. जब वह होश में आते तब भी उनकी हालत बहुत खराब रहती और बहके-बदहवास से रहते. कुछ दिनों तक वह अपने आस-पास के लोगों से बात तक न कर सके और यहां तक कि उन्हें पहचानना भी मुश्किल हो रहा था. “एक बार तो हालत ऐसी हो गई कि उन्हें हमारे बच्चों तक के नाम याद नहीं थे," उनकी पत्नी ने मुझे बताया. एक दिन जब वह अस्पताल में थे तो एक डॉक्टर ने उनकी पत्नी को बताया कि उनकी हालत में सुधार हो रहा है. उन्होंने कहा, "मैं ये सोच कर अंदर गई कि मेरे पति बैठे होंगे और मुझे देखकर मुस्कुराएंगे लेकिन मैंने देखा कि वह बिस्तर पर लेटे हुए दीवार को घूर रहे थे. उन्होंने एक पल के लिए मेरी तरफ देखा लेकिन मुझे पहचाना नहीं. "

पुणे में स्थित सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया भारत भर में कई जगहों पर कोविशील्ड का परीक्षण कर रहा है. चेन्नई में रामचंद्र उच्च शिक्षा और अनुसंधान अस्पताल में जहां इसका परीक्षण चल रहा है, उसके शोधकर्ताओं ने 1 अक्टूबर को परीक्षण में शामिल प्रतिभागी को एक इंजेक्शन दिया. 10 दिन बाद प्रतिभागी को तंत्रिका संबंधी दिक्कतें शुरू होने लगीं. प्रतिभागी, उनकी पत्नी और उनके डॉक्टर का मानना ​​है कि परीक्षण के दौरान जो टीका उन्हें लगाया गया था उसके चलते ये लक्षण उभरे हैं लेकिन सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया ने कहा कि उनकी बीमारी का दवा परीक्षण से कोई लेना-देना नहीं है. परीक्षण में शामिल प्रतिभागी और सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया ने एक-दूसरे को कानूनी नोटिस भेजे हैं. इस पूरे प्रकरण ने वैक्सीन के उम्मीदवारों और अनुमोदित टीकों के बारे में शिकायतों के मामले में कंपनी और सरकार की प्रतिक्रिया पर सवाल उठाया है. यह भारत में नैदानिक ​​परीक्षणों में पारदर्शिता की कमी और उनके नियामक ढांचे की कमियों को भी उजागर करता है.

11 अक्टूबर को परीक्षण में शामिल प्रतिभागी जब उठे तो उन्हें तेज सर दर्द था और मतली आ रही थी. वह ज्यादातर वक्त सोते रहे लेकिन जब वह फिर से उठे तो उनके व्यवहार में गड़बड़ी दिखाई दी. वह अपने परिवेश से नाराज, चिड़चिड़े और अनजान थे. देर शाम तक उन्हें रामचंद्र उच्च शिक्षा और अनुसंधान अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां उन्हें परीक्षण खुराक दी गई. वह बेहोश थे और उनकी शिराओं में तरल पदार्थ डाला गया. परीक्षण करने वाले डॉक्टरों ने 16 दिनों तक उनका इलाज किया.

प्रतिभागी की पत्नी ने मुझे बताया कि परीक्षण स्थल पर डॉक्टरों और मुख्य जांचकर्ता ने सुझाव दिया कि उनमें विटामिन की कमी हो सकती है या उन्हें स्व-प्रतिरक्षा विकार हो सकता है जिसके चलते उनकी हालत ऐसी हुई हो. हालांकि, उनकी जांच में ऐसे किसी ठोस कारण या अंतर्निहित स्थिति का पता चला जिसके चलते एंसेफैलोपैथी हो सकता था. "जब भी मैं पूछती कि उन्हें क्या समस्या हो सकती है, किस कारण से ऐसा हुआ तो वे मुझे बताते कि मुझे खुश होना चाहिए कि मेरा पति ठीक हो रहा है," उन्होंने कहा.

26 अक्टूबर को उनके परिवार ने अस्पताल से उन्हें छुट्टी देने का अनुरोध किया. तब तक प्रतिभागी थोड़ा-बहुत पहचाने लगे थे और परिवार के सदस्यों तथा स्वास्थ्य कर्मचारियों के साथ बातचीत करने में सक्षम थे. वह उल्टी किए बिना भी ठोस आहार ले रहे थे. हालांकि वह उलझन में रहे और इस बात पर ध्यान लगाने या याद करने में नाकाम रहे कि जब वह अस्पताल में थे उस दौरान क्या हुआ था. उनकी पत्नी ने मुझे बताया कि अस्पताल से छुट्टी होने के बाद भी हफ्तों तक उनकी हालत ऐसी ही रही और इसलिए परिवार ने दूसरे डॉक्टर से सलाह लेने का फैसला किया. "परीक्षण स्थल पर डॉक्टरों ने मेरे पति का इलाज किया लेकिन उन्होंने हमें यह नहीं बताया कि अचानक हुई इस बीमारी का कारण क्या है और उनकी हालत में भी कोई सुधार नहीं था ऐसी हालत में हमारे पास अन्य न्यूरोलॉजिस्ट से, जो दवा परीक्षण में शामिल नहीं थे, सलाह लेने के अलावा कोई विकल्प नहीं था," उनकी पत्नी ने मुझसे कहा.

परिवार ने चेन्नई के अपोलो अस्पताल में न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. जहीर अहमद सईद से सलाह ली. सईद ने कई जांचें की लेकिन तंत्रिका संबं​धी दिक्कत का कारण नहीं मिल सका. उन्होंने कहा कि "न्यूरो मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन से पता चलता है'' कि व्यक्ति के मस्तिष्क के काम करने के तरीके और संरचना ''में बहुत नाजुक से बदलाव हुए हैं." उन्होंने 21 नवंबर को लिखे एक पत्र में इन टिप्पणियों को लिखा है, जिसे प्रतिभागी के वकील ने मुझे दिखाया. इस बीच परीक्षण में शामिल प्रतिभागी और उनके परिवार से सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया या सेंट्रल ड्रग्स स्टैंडर्ड कंट्रोल ऑर्गेनाइजेशन ने किसी तरह का संपर्क नहीं किया. उन्होंने कहा, ''किसी ने भी हमें जांच करने या किसी भी अन्य गतिविधि के बारे में सूचित नहीं किया. हमें खुद के भरोसे छोड़ दिया गया. हम परेशान थे और नाराज थे और हम इस घटना को सबके सामने बताना चाहते थे," प्रतिभागी की पत्नी ने कहा. 

21 नवंबर को प्रतिभागी और उनके परिवार ने आईसीएमआर के महानिदेशक बलराम भार्गव, सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया के सीईओ अदार पूनावाला, ड्रग्स कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया वेणुगोपाल जी सोमानी, एस्ट्राजेनेका के सीईओ पास्कल सोरियट, ऑक्सफोर्ड वैक्सीन के मुख्य जांचकर्ता एंड्रयू पोलार्ड और पीवी श्री रामचंद्र उच्च शिक्षा और अनुसंधान अस्पताल के कुलपति विजयराघवन को कानूनी नोटिस भेजा है. 29 नवंबर को सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया ने एक बयान जारी किया जिसमें 100 करोड़ रुपए से अधिक के नुकसान की मांग की धमकी दी है. उन्होंने दावा किया कि प्रतिभागी की हालत और वैक्सीन के बीच कोई संबंध नहीं है.

यह देखते हुए कि गंभीर प्रतिकूल प्रतिक्रिया ने परीक्षण के संबंध में कई सवाल उठाए थे, दवाइयों के उपयोग पर काम करने वाले गैर-सरकारी संगठनों के एक स्वतंत्र नेटवर्क अखिल भारतीय ड्रग एक्शन नेटवर्क के सदस्यों ने इस तथ्य पर चिंता व्यक्त करते हुए एक पत्र लिखा था जिसमें एसआईआई ने 6 दिसंबर को सीडीएससीओ से आपातकालीन स्वीकृति अनुरोध किया था. 8 दिसंबर का पत्र कोविशील्ड परीक्षण के सह-प्रायोजक भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद, नीती अयोग के सदस्य विनोद के पॉल, जो कोविड-19 टीकाकरण पर विशेषज्ञ समिति के प्रमुख हैं, और स्वास्थ्य सचिव और नैदानिक ​​परीक्षण नियमों के लिए शीर्ष प्राधिकरण राजेश भूषण को संबोधित किया गया था. इस पत्र में परीक्षण में शामिल प्रतिभागी को कानूनी नोटिस भेजने के एसआईआई के फैसले की भी निंदा है. "परीक्षण के सह-प्रायोजक होने के नाते आईसीएमआर को कंपनी द्वारा इस तरह की धमकी की रणनीति को रोकना चाहिए," एआईडीएएन के सदस्यों ने लिखा.

1 दिसंबर को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में यह दावा करते हुए कि मामला विचाराधीन है, भूषण ने कहा कि वह इस मामले पर कोई टिप्पणी नहीं कर सकते. अगले दिन समाचार एजेंसी प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया ने बताया कि सोमानी, जो क्लिनिकल ट्रायल को मंजूरी देने के लिए जिम्मेदार सीडीएससीओ में शीर्ष अधिकारी हैं, ने गंभीर प्रतिकूल प्रतिक्रिया और कोविशील्ड वैक्सीन के परीक्षण खुराक के बीच किसी भी तरह के जुड़ाव को खारिज कर दिया है. पीटीआई ने बताया कि सोमानी का मूल्यांकन एक स्वतंत्र विशेषज्ञ समिति की सिफारिशों पर आधारित था. इंडियन जर्नल फॉर मेडिकल एथिक्स की एक परामर्श संपादक संध्या श्रीनिवासन ने कहा, “बिना इस पारदर्शिता के कि प्रतिकूल प्रतिक्रिया से कैसे निपटा गया और कैसे सरकारी अधिकारियों ने निष्कर्ष निकाला कि दोनों के बीच कोई संबंध नहीं है, हमारे समाने कई अनुत्तरित सवालों और नैतिक चिंताओं को खड़ा करता है."

दवाओं, टीकों या चिकित्सा उपकरणों के परीक्षण के लिए सभी नैदानिक ​​परीक्षण संभावित प्रतिकूल प्रतिक्रियाओं के लिए तैयार रहते हैं. ज्यादातर मामलों में परीक्षण खुराक की प्रतिक्रियाएं हल्की और गैर-जानलेवा होती हैं. कोविशील्ड के परीक्षणों में प्रतिभागियों को कहा गया था कि वे जहां इंजेक्शन लगा है उसमें दर्द, सूजन और लाल हो जाने, थकान, बुखार और ठंड लगने जैसे लक्षणों पर ज्यादा ध्यान न दें. हल्के से लेकर मध्यम स्तर की ये प्रतिकूल लक्षण आमतौर पर कुछ दिनों के भीतर गायब हो जाते हैं. लेकिन हर परीक्षण गंभीर प्रतिकूल घटना या एसएई पीड़ित प्रतिभागी के जोखिम को बढ़ाता है. सीडीएससीओ के अनुसार, गंभीर प्रतिकूल घटना “से मौत हो सकती है, रोगी को अस्पताल में भर्ती करना पड़ सकता है और लंबे समय तक अस्पताल में भर्ती रहना पड़ सकता है, निरंतर या गंभीर विकलांगता या अक्षमता हो सकती है, बच्चा पैदा करने में विसंगति या जन्म दोष हो सकता है या जीवन के लिए खतरा हो सकता है.” परीक्षण में नामांकित रोगी में देखी गई ऐसी किसी भी प्रतिक्रिया को एसएई के रूप में संदर्भित किया जाता है, भले ही अभी यह तय किया जाना बाकी हो कि क्या ऐसा एसएई परीक्षण के कारण ही हुआ था.

पूरी रपट पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें


चाहत राणा, https://hindi.caravanmagazine.in/health/covishield-trial-volunteers-illness-highlights-gaps-in-india-regulations-hindi


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