Resource centre on India's rural distress
 
 

आज भी जिंदा है Mother India के सुक्खी लाला, किसान ने बेटे के इलाज के लिए लिया कर्जा, हड़प ली पूरी जमीन

-गांव कनेक्शन,

" हमारा जवान लड़का अस्पताल में भर्ती था। जेवर बेचकर और उधार लेकर डेढ़ लाख रुपए लगा चुके थे। इलाज के लिए और पैसे की ज़रुरत थी तो एक एकड़ खेत 26 हजार में गिरवी रख दिया। लेकिन बनिया (साहूकार) ने बेईमानी की और हमारी पूरी धरती (4 एकड़ ज़मीन) हड़प ली। बेटा और ज़मीन दोनों चले गए," कहते-कहते बुजुर्ग मथुराबाई पल्लू में मुंह छिपाकर फफक फफक कर रोने लगती हैं।

मथुराबाई के साथ 2008 में हुआ ये हादसा साल 1957 में आई फिल्म मदर इंडिया की याद दिलाता है। फिल्म के शुरुआती सीन में सुंदर चाची अपने बेटे श्यामू (राजकुमार) की शादी के लिए गांव के सुक्खी लाला से 500 रुपए कर्ज़ लेती हैं, कर्ज़ लेते समय तय हुआ था कि सुक्खी लाला फसल का एक चौथाई हिस्सा ब्याज के रुप में लेगा, लेकिन फसल पकने पर पता चलता है कि लाला तीन हिस्से लेगा और सुंदर चाची श्यामू को एक हिस्सा मिलेगा। लाला ने सुंदर चाची से सादे कागज़ पर अंगूठा लगवा रखा था।

भारत में साहूकार, बेईमान बनिया और सेठों के बीच पिसते किसानों की जिंदगी पर बनी इस फिल्म को आए दशकों हो गए। इन सालों में दुनिया बदल गईं, आदमी चांद पर पहुंच गया, कई सरकारें आईं, चली गईं लेकिन सुक्खी लाला कहीं नहीं गए। वो चेहरा और नाम बदलकर आज भी किसानों का खून चूस रहे हैं, ज़मीनें हड़प रहे हैं।

मथुरा बाई का वीरान घर बुंदेलखंड (यूपी वाले हिस्से) के ललितपुर जिले के गगनिया गांव में है। इलाज के दौरान जिस बेटे की मौत हुई थी, उसकी पत्नी, अपने दो बच्चों को लेकर मायके चली गई। दूसरा बेटा हरियाणा में अपने परिवार के साथ रहकर मज़दूरी करता है। गांव में बचे मथुरा बाई और उनके पति भगवान दास कभी बनिया को कोसते हैं तो कभी अपनी किस्मत को।

"इस उम्र में हम दोनों से मज़दूरी नहीं होती। बहू भी हमें छोड़कर चली गई क्योंकि यहां खाने पीने की दिक्कत थी। दूसरा बेटा परदेश में है। ये खाली घर हमें काटने को दौड़ता है।" अपनी जिंदगी में आई इन मुश्किलों के लिए वो ज़मीन गिरवी रखने वाले बनिया (साहूकार) को ज़िम्मेदार मानती हैं।

पथरीली ज़मीन और अक्सर सूखे का सामने करने वाले बुंदेलखंड में कर्ज़ लोगों की ज़िंदगी का हिस्सा है। बुंदेलखंड में खेती, खनन और पलायन तीन आजीविका के ज़रिया हैं। ज्यादातर ज़मीन खेती योग्य नहीं, जहां फसल होती भी है वहां अक्सर मौसम की मार पड़ जाती है। मौसम से फसलें बर्बाद होती हैं तो बैंकों के बाहर घूम रहे उन्हें कर्ज़ के चुंगल में फंसा देते हैं। थक-हार कर किसान साहूकारों के पास पहुंचते हैं, फिर वो कर्ज़ के चक्रव्यूह में फंसते चले जाते हैं। कई किसान आत्महत्या कर लेते हैं, पिता का कर्ज़ बेटे उतारते हैं तो ज्यादातर अपनी जमीनें गंवा देते हैं, बिल्कुल वैसे जैसे भगवान दास के साथ हुआ।

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