हर चार में से तीन ग्रामीण भारतीयों को नहीं मिल पाता पौष्टिक आहार: रिपोर्ट

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published Published on Oct 18, 2020   modified Modified on Oct 18, 2020

-द वायर,

इंटरनेशनल फूड पॉलिसी रिसर्च इंस्टिट्यूट द्वारा प्रकाशित एक पेपर में कहा गया है कि ग्रामीण इलाकों में रहने वाले हर चार में से तीन भारतीयों को पौष्टिक आहार नहीं मिल पाता है.

बता दें कि हाल में जारी वैश्विक भूख सूचकांक 2020
में भारत 107 देशों की सू
ी में 94वें स्थान पर है
 और भूख की ‘गंभीर’ श्रेणी में है.

विशेषज्ञों ने इसके लिए खराब कार्यान्वयन प्रक्रियाओं, प्रभावी निगरानी की कमी, कुपोषण से निपटने का उदासीन दृष्टिकोण और बड़े राज्यों के खराब प्रदर्शन को दोषी ठहराया है.

द हिंदू के अनुसार, पीअर-रिव्यूड पत्रिका फूड पॉलिसी में प्रकाशित अफोर्डबिलिटी ऑफ न्यू
्रिशियस डाइट्स इन रूर
ल इंडिया
  शीर्षक वाले इस हालिया पेपर को संस्थान के अर्थशास्त्री कल्याणी रघुनाथन और शोधकर्ता डेरेक डी. हीडे ने वरिष्ठ शोधकर्ता एना हरफोर्थ के साथ मिलकर लिखा है.

2011 के राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण (एनएसएस) से ग्रामीण खाद्य मूल्य और मजदूरी की जानकारी के आधार पर पेपर इस निष्कर्ष पर पहुंचा है कि भारत में कुपोषण स्थानिक है.

इस तथ्य के बावजूद कि 2015-16 में 38 फीसदी स्कूल जाने से पहले की उम्र वाले बच्चों का विकास रुक गया और 21 फीसदी कमजोर हो गए जबकि आधे से अधिक मां और बच्चे एनीमिया से ग्रसित हो गए, पेपर ने पाया कि आश्चर्यजनक रूप से बहुत कम लोग आहार, विशेष रूप से भारत में पौष्टिक आहार की उपलब्धता पर चर्चा करते हैं.

पिछले साल, वैश्विक भूख सूचकांक में भारत 117 देशों की सूची में भारत का 102वां स्थान था.

भारत के साथ-साथ पड़ोसी देशों- बांग्लादेश, म्यांमार और पाकिस्तान भी ‘गंभीर’ श्रेणी में हैं, लेकिन भूख सूचकांक में भारत से ऊपर हैं. बांग्लादेश 75वें, म्यांमार 78वें और पाकिस्तान 88वें स्थान पर हैं.

वहीं, नेपाल 73वें और श्रीलंका 64वें स्थान पर हैं. दोनों देश ‘मध्यम’ श्रेणी में आते हैं.

पेपर में कहा गया कि ग्रामीण भारत में भयावह आहार परिदृश्य के लिए जिम्मेदार समस्याओं में कम मजदूरी और भारत के कृषि क्षेत्र के सामने आने वाली महत्वपूर्ण संरचनात्मक समस्याएं हैं.

पेपर के लेखकों ने कहा है कि साल 2001 से 2011 के बीच की अवधि में आहार की बढ़ती लागत के बावजूद  उस समय में ग्रामीण मजदूरी भी बढ़ी है. हालांकि, 2011 में पूर्ण रूप से पौष्टिक आहार अकुशल मजदूरी की तुलना में महंगे थे, जहां लगभग 50-60 फीसदी पुरुष और लगभग 70-80 फीसदी महिलाएं मनरेगा में दैनिक मजदूरी करते हैं.

पेपर में पाया गया है कि औसत ग्रामीण परिवारों और अन्य गैर-खाद्य खर्चों पर आश्रितों की संख्या को देखते हुए 45-64 फीसदी ग्रामीण गरीब भारत के राष्ट्रीय खाद्य-आहार संबंधी दिशानिर्देशों को पूरा करने वाले पौष्टिक आहार नहीं ले सकते हैं.

पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें. 


द वायर, http://thewirehindi.com/144100/hunger-food-nutritional-diet-rural-india/


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