Resource centre on India's rural distress
 
 

पिछले दो सालों में कश्मीर के उस सेब उद्योग की कमर टूट गई है जो यहां की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है

-सत्याग्रह,

अगर कश्मीर घाटी के पिछले कुछ महीनों के मौसम का हाल एक लाइन में बताना हो तो शायद वह लाइन “मैदानों जैसी गर्मी, बार-बार ओले गिरना, कम बारिश और सर्दियों में ज़्यादा बरफ” होगी.

हाल यह है कि इस बार का अगस्त पिछले 40 सालों में सबसे गरम रहा है और यही हाल जुलाई का भी था. इस बार गर्मियों में कश्मीर का अधिकतम तापमान 35.7 तक चला गया था और औसत बारिश 50 प्रतिशत के करीब कम हुई है. इससे पहले इतना तापमान 1983 की अगस्त में यानी 37 साल पहले रिकॉर्ड किया गया था.

कश्मीर के मौसम विभाग के निदेशक, सोनम लोटस इस बात की पुष्टि करते हुए कहते हैं. “यह बहुत चिंताजनक बात है कि जिस समय बारिश की सबसे ज़्यादा ज़रूरत होती है तभी ऐसा हो रहा है. जबकि देश के बाकी हिस्सों में ठीक-ठाक बारिश हुई है.”

उनके विभाग के आंकड़े देखें तो दक्षिण कश्मीर के चार जिलों में, जहां सेब की खेती सबसे ज़्यादा होती है, बारिश 80 प्रतिशत से भी कम हुई है. लेकिन औसत में देखा जाये तो इस बार कश्मीर घाटी में बारिश करीब 50 प्रतिशत कम हुई है.

आम ज़िंदगी में तो खैर लोग जैसे-तैसे गर्मी या सर्दी बर्दाश्त कर ही लेते हैं, लेकिन इस बदलते मौसम की मार कश्मीर के लगभग उन 35 लाख लोगों पर पड़ने वाली है, जो सेब की खेती और व्यापार से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े हुए हैं.

कश्मीर घाटी की अर्थव्यवस्था की रीढ़ की हड्डी कही जाने वाली ‘एपल इंडस्ट्री’ मौसम की इस मार से सबसे ज़्यादा प्रभावित होगी और दुर्भाग्यवश यह लगातार तीसरा साल है जब कश्मीर की इस इंडस्ट्री पर संकट के बादल मंडराते नज़र आ रहे हैं.

इससे पहले कि यह विस्तार से बताया जाये कि यह बदलता मौसम कश्मीर की ‘एपल इंडस्ट्री’ को कहां ले जा सकता है, यह बताना ज़रूरी है कि यहां का सेब यहां की अर्थव्यवस्था के लिए क्या महत्व रखता है और पिछले दो सालों में ऐसा क्या हुआ है जिसने इस सैक्टर को गंभीर रूप से नुकसान पहुंचाया है.

सेब और कश्मीर की अर्थव्यवस्था

कश्मीर भारत की कुल सेब पैदावार का 80 फीसदी हिस्सा उगाता है जो भारत को दुनिया में पांचवां सबसे बड़ा सेब उत्पादक देश बनाता है. हर साल कश्मीर से लगभग 20 से 21 लाख मीट्रिक टन सेब देश के अन्य भागों में और विदेश में एक्सपोर्ट होत है.

कश्मीर की इस इंडस्ट्री का वार्षिक कारोबार आठ से नौ हज़ार करोड़ रुपये के बीच होता है और देखा जाये तो यह इंडस्ट्री जम्मू-कश्मीर की जीडीपी का करीब 10 प्रतिशत हिस्सा है. करीब सात लाख परिवार, कुल मिला कर लगभग 35 लाख लोग, इस इंडस्ट्री से अपने जीवन को चलाते हैं. और कश्मीर घाटी में करीब करीब तीन लाख हेक्टेयर ज़मीन पर सेब की खेती की जाती है.

जितनी बड़ी यह इंडस्ट्री है दुर्भाग्यवश इस पर संकट भी उतने ही बड़े आते हैं, चाहे वह 2018 में बेवक्त बरफ का गिरना हो या 2019 का लॉकडाउन या फिर इस साल की अभूतपूर्व गर्मी.

2018 की बरफ

उस साल नवम्बर में नौ साल के बाद बरफ पड़ी थी. नौ नवम्बर की रात को कुछ घंटों के हिमपात हुआ था और हजारों लोगों की साल भर की मेहनत के साथ-साथ लाखों लोगों की उम्र भर की पूंजी भी डूब गयी थी.

इसकी वजह से लाखों सेब के पेड़ टूट गए थे और हाल ही में उतारे गए सेब बर्बाद हो गए थे. कश्मीर चैम्बर ऑफ़ कॉमर्स एंड इंडस्ट्रीज (केसीसीआई) ने तब हुए नुकसान का अनुमान 500 करोड़ के आस पास लगाया था.

“ये अनुमान सिर्फ फसल बर्बाद होने का था. पेड़ों की जो तबाही थी वो अलग थी. उसका अभी तक कोई अनुमान नहीं लगा है” दक्षिण कश्मीर के शोपियां जिले के एक सेब व्यापारी, तनवीर अहमद सत्याग्रह से बात करते हुए कहते हैं.

हालांकि, इन किसानों को पेड़ों की मरम्मत करने के लिए सरकार से पैसे मिले थे लेकिन वे न के बराबर थे. “मेरे बगीचे में करीब 50 पेड़ खराब हुए थे और सरकार के पैसों से सिर्फ दो पेड़ ही ठीक हो पाये थे, बाकी अपनी जमा पूंजी लगा के करना पड़ा” तनवीर कहते हैं.

कश्मीर में सेब की खेती करने वाले लोग अच्छे दाम न मिलने के चलते, अपनी फसल कोल्ड स्टोर्स में रख दिया करते हैं. जिनका कुछ माल बच गया था, उन्होने 2018 में भी ऐसा ही किया. उन्होंने सोचा कि अगले साल मार्च में इसको देश के अन्य भागों में भेज देंगे.

लेकिन 14 फरवरी को पुलवामा हमला हो गया. पुलवामा हमले के बाद जम्मू-श्रीनगर राज मार्ग पर ऐसे प्रतिबंध लगे कि इन लोगों का गाड़ियों में लदा माल रास्ते में ही खराब होने लगा. आगे जो हुआ वह सत्याग्रह ने इससे पहले एक लेख में विस्तार से बता दिया था.

इन सब चीजों को परे रख कर कश्मीर में सेब के व्यापारी और किसान आगे आने वाले साल से उम्मीद लगाए बैठे थे. उन्होने सोचा था कि 2019 का सेब का सीजन उनके लिए अच्छा साबित होगा.

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