लोकतंत्र की संरचना में ही असहमति गुंथी होती है

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published Published on Nov 22, 2020   modified Modified on Nov 22, 2020

-सत्याग्रह,

असहमति की व्याप्ति

डेढ़ेक बरस पहले अहमदाबाद विश्वविद्यालय की अध्यापिका प्रतिष्ठा पण्ड्या ने फ़ोन कर बताया कि उन्होंने मेरे सम्पादन में आयी ‘इण्डिया डिसेण्ट्स’ संचयिता देखी है और मैं असहमति पर उनके छात्रों और सहकर्मियों से संवाद करने उनके द्वारा संचालित एक बौद्धिक सीरीज़ ‘नालन्दा’ में भाग लूं. जाना कई कारणों से नहीं हो पाया और फिर कोविड महामारी आ गयी. सो अब यह संवाद ऑनलाइन हुआ. छात्रों और अध्यापकों ने पूरी तैयारी के साथ चर्चा में भाग लिया. मेरे लिए सुखद अचरज की बात यह थी कि सभी ने उस संचयन की भूमिका ‘असहमति की बहुलता’ ध्यान से पढ़ रखी थी. जो प्रश्न छात्रों ने पूछे वे सभी विचारोत्तेजक थे. उनमें से कई स्नातक स्तर की पढ़ाई कर रहे हैं और उनमें ईमानदार जिज्ञासा और प्रश्नाकुलता है. इसने बहुत आश्वस्त किया. यह प्रभाव पड़ा कि असहमति का भूगोल चुपचाप कम से कम कुछ युवा क्षेत्रों में फैल रहा है.

निरा मतभेद असहमति नहीं कहा जा सकता हालांकि बिना मतभेद के असहमति संभव नहीं है. पर असहमति भेद से आगे जाती है. उसमें किसी व्यापक व्यवस्था या सत्ता से, किसी बुनियादी अर्थ में, उसकी किसी दृष्टि, नीति, कर्म, प्रत्यक्ष या परोक्ष कार्रवाई आदि से मतभेद शामिल होता है. असहमति अपने मूल में नैतिक, प्रभाव और उपस्थिति में सामाजिक और बौद्धिक होती है. कई और शब्द हैं जो असहमति के नजदीकी रिश्तेदार हैं: प्रतिरोध, असहयोग, सिविल नाफ़रमानी, आपत्ति, प्रश्नांकन, विरोध इनमें से कुछ हैं. असहमति हिंसक भी हो सकती है और इस कारण अन्ततः विफल और पराजित होने के लिए अभिशप्त. उसका अहिंसक रूप ही अधिक प्रभावशाली और टिकाऊ होता है.

लोकतंत्र ऐसी व्यवस्था है जिसमें न सिर्फ़ असहमति की जगह, आदर और स्वागत होते हैं बल्कि कई राजनैतिक दलों के अस्तित्व और सक्रियता के रूप में वह उसकी संरचना में ही गुंथी होती है. असहमति के बिना लोकतंत्र सम्भव और सशक्त नहीं हो सकता. इस समय भारतीय लोकतंत्र खुले रूप में बहुसंख्यकतावाद की चपेट में है और असहमति की प्रायः सभी अभिव्यक्तियों को बाधित और दण्डित करने की प्रवृत्ति का वर्चस्व सा स्थापित हो गया है. ऐसे क़ानूनों और कार्रवाइयों की प्रचुरता सी है जो रोज़ असहमति का दमन करने के लिए सक्रिय हैं. स्वयं असहमति के सहारे सत्तारूढ़ शक्तियां अब असहमति को दबाने, चुप कराने का लगातार उपक्रम कर रही हैं.

जो प्रश्न पूछे गये उनके उत्तर में यह स्पष्ट किया गया कि भारत में असहमति की कम से कम तीन हज़ार बरस पुरानी परम्परा रही है. इस परम्परा ने वैदिक काल से लेकर अपने समूचे इतिहास में धर्म, आस्था, दर्शन, ज्ञान आदि में असहमति को जगह और सम्मान दिये हैं. आखि़रकार बौद्ध, जैन और सिख धर्म असहमति से ही उपजे धर्म हैं और भारत में ही जन्मे हैं. जो भारत में वाद-विवाद-संवाद को हाशिये पर डालता है, वह लोकतंत्र भर से नहीं भारतीय परम्परा से द्रोह करता है.

हमारे रोज़मर्रा, की ज़िन्दगी में इधर राजनीति, धर्म और मीडिया के तिहरे प्रभाव में बेवजह आक्रामकता, नागरिक व्यवहार में सौम्यता और परस्पर आदर के बजाय आहत होने, झगड़ने-लड़ने के मुहावरे बढ़ते जा रहे हैं. एक तरह का नागरिक लयभंग हो रहा है. सार्वजनिक जीवन तो अब हिंसा-घृणा-हत्या-बलात्कार आदि की अभद्र-अश्लील और हिंसक भाषा से आक्रान्त हो रहा है. झूठों का ऐसा घटाटोप है कि सच दिखना लगभग बन्द हो गया है. राज्य हर दिन अपनी मर्यादाओं का उल्लंघन कर रहा है और समाज उसका शिकार है. साफ़ है कि किसी भी तरह की असहमति अस्वीकार्य है. दूसरे शब्दों में, असहमति जोखिम और साहस का कर्म है और उसे व्यक्त करने वाले मुश्किल में पड़ते हैं. वर्तमान राजनीति में ध्रुवीकरण, संवादहीनता, दुर्व्याख्या और हिन्दुत्व आदि पर भी चर्चा हुई जिनके बारे में पहले ही लिखा जा चुका है.

पूरा लेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें. 


अशोक वाजपेयी, https://satyagrah.scroll.in/article/136106/loktantra-asahamati-kabhi-kabhar-ashok-vajpeyi


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