भाजपा शासित राज्यों में कथित ‘लव जिहाद’ पर अंकुश के लिए प्रस्तावित कानून कितने प्रभावी होंगे

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published Published on Nov 22, 2020   modified Modified on Nov 22, 2020

-द प्रिंट,

सरकार ने अगर समय रहते विवाह के लिये धर्मांतरण की घटनाओं पर अंकुश पाने के लिये उच्चतम न्यायालय के सुझाव पर विचार करके कदम उठाये होते तो आज शायद ‘लव जिहाद’ नाम से सुर्खियां बन रही धर्मांतरण के प्रयास की घटनायें नहीं होतीं. लेकिन हमारी सोच बन गयी है कि न्यायिक व्यवस्था में दिये गये सुझावों पर उचित समय पर विचार कर लिया जायेगा.

हिन्दू पुरुषों द्वारा अपनी पत्नी से विवाह विच्छेद के बगैर ही इस्लाम धर्म कबूल करके दूसरी शादी करने की घटनाओं के संदर्भ मे उच्चतम न्यायालय में 1995 में धर्म परिवर्तन कानून बनाने का सुझाव दिया था. अगर इस फैसले पर गंभीरता से विचार किया गया होता तो संभवत: मौजूदा स्थिति से बचा जा सकता था.

इस समय, मुस्लिम लड़कों द्वारा कथित तौर पर हिन्दू लड़कियों को बहला-फुसलाकर उनसे शादी करने और फिर उनका धर्म परिवर्तन कराने के प्रयासों को ‘लव जिहाद’ का नाम दिया जा रहा है. केरल और उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में यह मुद्दा उठता रहता है. हाल ही में फरीदाबाद में एक लड़की की हत्या के मामले को भी लव जिहाद से जोड़ा गया.

इस कथित ‘लव जिहाद’ को लेकर भाजपा और कांग्रेस आमने सामने आती नजर आ रही हैं. ‘लव जिहाद’ पर अंकुश पाने तथा इसे दंडनीय अपराध बनाने के भाजपा शासित राज्यों की पहल को कांग्रेस शासित राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने भाजपा का एजेंडा करार देते हुये कहा है कि शादी व्यक्तिगत स्वतंत्रता का मामला है और इसके लिये कानून बनाना असंवैधानिक है.

भाजपा शासित राज्यों में कथित लव जिहाद को दंडनीय अपराध बनाने की कवायद और कांग्रेस शासित राज्य सरकारों की ओर से इसके प्रतिवाद को देखते हुये इस संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता कि यह राष्ट्रीय स्तर पर धर्मांतरण निरोधक कानून बनाने के लिये सरकार पर दबाव डालने का कोई प्रयास हो.

राष्ट्रीय स्तर पर धर्मांतरण निरोधक कानून बनाने के कई बार असफल प्रयास हुये हैं. इस तरह का पहला प्रयास 1954 में हुआ था. लोकसभा में भारतीय धर्मांतरण विनियमन एवं पंजीकरण विधेयक पेश किया गया था लेकिन बहुमत के अभाव में यह सदन में पारित नहीं हो सका था. इसके बाद, 1960 और 1979 में भी ऐसे प्रयास हुये थे.

शादी के लिये धर्मांतरण कोई नयी समस्या नहीं है. यह बहुत पुरानी बीमारी है. पहले अक्सर हिन्दू व्यक्ति पहली पत्नी के रहते हुये दूसरी महिला से विवाह करने के लिये इस्लाम धर्म कबूल कर लेते थे. इसका नतीजा यह होता था कि अक्सर एक साथ दो दो महिलाओं की जिंदगी बर्बाद होती थी.

हिन्दू विवाह कानून के तहत हुये विवाह में पहली पत्नी के रहते हुये धर्म परिवर्तन कर दूसरा विवाह करने की घटनाओं को लेकर गैर सरकारी संगठन कल्याणी की अध्यक्ष सरला मुद्गल और कई अन्य पीड़ित महिलाओं ने देश की सर्वोच्च अदालत का दरवाजा खटखटाया था.

इस प्रकरण में न्यायालय के समक्ष संविधान के अनुच्छेद 44, भारतीय दंड संहिता की धारा 494 और हिन्दू विवाह कानून, 1955 की धारा 13 से संबंधित मुद्दे विचारणीय थे. इस मामले की सुनवाई के दौरान न्यायालय ने पाया कि पहली पत्नी के जीवित रहते हुये दूसरी शादी करने के लिये पुरुष इस्लाम धर्म कबूल करके वास्तव में धर्म का दुरुपयोग कर रहे हैं.

स्थिति की गंभीरता को देखते हुये उच्चतम न्यायालय ने 10 मई 1995 को न्यायमूर्ति कुलदीप सिंह और न्यायमूर्ति आर एम सहाय की पीठ ने सरला मुदगल बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (Sarla Mudgal v. Union Of India) प्रकरण में धर्म का दुरुपयोग रोकने के इरादे से धर्म परिवर्तन कानून बनाने की संभावना तलाशने के लिये एक समिति गठित करने पर विचार का सुझाव दिया था.

न्यायालय ने कहा था कि किसी भी व्यक्ति द्वारा धर्म का दुरुपयोग रोकने के लिये सरकार को तत्काल धर्म परिवर्तन कानून बनाने के लिये एक समिति के गठन पर विचार करना चाहिए. न्यायालय का मत था कि प्रस्तावित कानून में यह प्रावधान किया जा सकता है कि धर्म परिवर्तन करने वाला कोई भी व्यक्ति पहली बीवी को तलाक दिये बगैर दूसरी शादी नहीं कर सकता है और यह प्रावधान हिन्दू, मुस्लिम, सिख,ईसाई, जैन या बौद्ध सभी पर समान रूप से लागू किया जाना चाहिए.

यही नहीं, न्यायालय ने इस कानून में ही गुजारा भत्ते और उत्तराधिकार संबंधी प्रावधान करने का भी सुझाव दिया था ताकि मृत्यु के बाद हितों के टकराव को टाला जा सके. न्यायालय की राय थी कि इस तरह के कदम देश के लिये समान नागरिक संहिता बनाने में काफी मददगार हो सकते हैं.

इससे पहले, तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश वाई वी चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने 23 अप्रैल, 1985 को मोहम्मद अहमद खान बनाम शाह बानो बेगम और अन्य (Mohd. Ahmed Khan vs Shah Bano Begum And Ors) प्रकरण में सुनाये गये फैसले में भी अनुच्छेद 44 का जिक्र करते हुये समान नागरिक संहिता की हिमायत की थी.

लेकिन, विधि आयोग इससे सहमत नहीं है. आयोग ने 31 अगस्त, 2018 को सरकार को सौंपे अपने परामर्श पत्र में साफ शब्दों में कहा था कि देश में इस समय समान नागरिक संहिता न तो अपेक्षित है और न ही यह व्यावहारिक.

विधि आयोग के परामर्श पत्र के बाद हालांकि, समान नागरिक संहिता का मुद्दा काफी हद तक पार्श्व में चला गया लेकिन अचानक ही ‘लव जिहाद’ का मुद्दा तेजी से सुर्खियों में आया और अब इसे दंडनीय अपराध बनाने के लिये नये सख्त कानून की चर्चा जोरों पर है.

हमारे देश का कानून किसी भी वयस्क लड़के या लड़की को अपनी मर्जी और अपनी पसंद से विवाह करने का अधिकार प्रदान करता है. यह शादी अंतर-जातीय या दूसरे धर्म के युवक या युवती के साथ हो सकती है. इस तरह का विवाह करने वाले जोड़े विशेष विवाह कानून के तहत इसका पंजीकरण भी कराते हैं.

कतिपय युवकों द्वारा छद्म नाम रखकर हिन्दू युवतियों के साथ मेलजोल बढ़ाने और फिर शादी करने और बाद में ऐसे व्यक्ति का हिन्दू नहीं बल्कि मुस्लिम होने की बात सामने आने की कई घटनायें हुयी हैं. मुस्लिम पति द्वारा अपनी हिन्दू पत्नी पर धर्म परिवर्तन के लिये दबाव डालना और ऐसा नहीं करने पर उसकी हत्या तक किये जाने के कई मामले हाल के दिनों में सुर्खियों में आये हैं और पुलिस ने अनेक गिरफ्तारियां भी की हैं.

इस समय, मप्र, गुजरात, ओडीशा, छत्तीसगढ़, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, झारखंड और अरुणाचल प्रदेश में धर्म स्वतंत्रता धर्मांतरण निरोधक नाम से कानून हैं. इन कानूनों में जबरन अथवा बहला-फुसलाकर या धोखे से धर्म परिवर्तन कराना निषेध और दंडनीय अपराध है. इन कानूनों में नाबालिग महिला या अनुसूचित जाति-जनजातियों के सदस्यों से संबंधित मामलों में ज्यादा सजा का प्रावधान है.

लेकिन, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, मध्य प्रदेश और कर्नाटक जैसे भाजपा शासित राज्यों की सरकारें विवाह की खातिर कथित रूप से धर्मांतरण पर अंकुश पाने के लिये कानून बनाने की तैयारियां कर रहे हैं और इसमें कठोर सजा का प्रावधान किये जाने की चर्चा है.

पूरा लेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें. 


अनूप भटनागर, https://hindi.theprint.in/opinion/proposed-legislation-to-curb-alleged-love-jihad-in-bjp-ruled-states/185083/


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