नये श्रम कानूनों का मक़सद अगर ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ रैंकिंग को ही सुधारना है तो ये कमाल के हैं

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published Published on Oct 7, 2020   modified Modified on Oct 8, 2020

-सत्याग्रह,

संसद में 23 सितंबर को श्रम कानून से जुड़े तीन अहम कोड बिल पास हो गए. सरकार ने बीते साल श्रम सुधार की बात कहते हुए 44 केंद्रीय श्रम कानूनों को मिलाकर चार कोड बिल तैयार किये थे. इनमें से तीन कोड बिल - औद्योगिक संबंध कोड बिल, सामाजिक सुरक्षा कोड बिल और व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य एवं कार्यदशा कोड बिल - पिछले महीने के अंत में पास हुए. चौथे कोड बिल - मजदूरी कोड विधेयक - को मोदी सरकार बीते साल ही पारित करा चुकी है. श्रम मंत्री संतोष गंगवार ने राज्यसभा में बिलों को पेश करते हुए इसे ऐतिहासिक करार दिया और कहा कि ‘श्रमिक कल्याण में यह मील का पत्थर साबित होगा. देश की आजादी के 73 साल बाद जटिल श्रम कानून सरल, ज्यादा प्रभावी और पारदर्शी कानून में बदल जाएंगे.’ संतोष गंगवार के मुताबिक लेबर कोड श्रमिकों के अधिकारों की रक्षा करेगा और यह उद्योगों को आसानी से चलाने में मदद करेगा.

हालांकि, सरकार के दावे से अलग श्रमिक संगठन श्रम कानूनों में हुए बदलाव को मजदूरों और कर्मचारियों के हक में नहीं बताते हैं. ये संगठन विशेष रूप से औद्योगिक संबंध कोड बिल से नाराज हैं और पूरे देश में इसका विरोध कर रहे हैं. देश की सबसे बड़ी दस ट्रेड यूनियन मोदी सरकार से श्रम कानूनों में किये गए बदलावों को वापस लेने की मांग कर रही हैं.

कोड बिल पर नाराजगी क्यों?

मजदूर यूनियनों से जुड़े नेताओं की मानें तो औद्योगिक संबंध कोड विधेयक के जरिए सरकार ने मजदूरों और यूनियनों के हाथ बांध दिए हैं. इस विधेयक के जरिये जो पहला बड़ा बदलाव किया गया है वह कर्मचारियों की नियुक्ति एवं छंटनी से जुड़ा है. विधेयक में कहा गया है कि जिन कंपनियों में कर्मचारियों की संख्या 300 से कम है, वे सरकार से मंजूरी लिए बिना ही अपने कर्मचारियों की छंटनी कर सकेंगी और इनकी जगह पर नए कर्मचारियों को रख सकेंगी. अब तक ये प्रावधान सिर्फ उन्हीं कंपनियों के लिए था, जिनमें 100 से कम कर्मचारी हों. किसी भी समय कर्मचारियों की छंटनी और यूनिट के शटडाउन की इजाज़त उन कंपनियों को भी दी जाएगी, जिनके कर्मचारियों की संख्या पिछले 12 महीने में हर रोज़ औसतन 300 से कम रही हो. कोड बिल में यह भी साफ़ तौर पर लिखा है कि सरकार अधिसूचना जारी कर इस न्यूनतम संख्या को बढ़ा भी सकती है.

मजदूर संगठन कानून में किए गए इस बदलाव का भारी विरोध कर रहे हैं. इनका कहना है कि कंपनियां इसका फायदा उठाकर बिना सरकारी मंजूरी के ज्यादा मजदूरों को तत्काल निकाल सकेंगी. देश के सबसे बड़े मजदूर संगठन - भारतीय ट्रेड यूनियन केंद्र (सीटू) के महासचिव तपन सेन का कहना है, ‘इन बदलावों के चलते 74 फीसदी से अधिक औद्योगिक श्रमिक और 70 फीसदी औद्योगिक प्रतिष्ठान ‘हायर एंड फायर’ व्यवस्था में ढकेल दिए जाएंगे, जहां उन्हें अपने मालिकों के रहम पर जीना पड़ेगा.’

औद्योगिक संबंध कोड विधेयक में यह भी जोड़ा गया है कि 300 से कम श्रमिकों वाले औद्योगिक प्रतिष्ठानों को स्थायी आदेश (स्टैंडिंग ऑर्डर) तैयार करने की आवश्यकता नहीं है, जबकि पहले यह छूट 100 से कम श्रमिकों वाले प्रतिष्ठानों को मिली थी. स्टैंडिंग ऑर्डर एक खास तरह का सामूहिक अनुबंध होता है, जो किसी कंपनी में सेवा शर्तों और नियमों का मानकीकरण करता है. इसमें किसी कर्मचारी की प्रोबेशन अवधि, उसे स्थायी करने और उसे नौकरी से निकालने की शर्तों से जुड़े प्रावधान शामिल होते हैं. किसी कर्मचारी के दुर्व्यवहार का निर्धारण, अनुशासनात्मक कार्रवाइयों और सजा देने के तरीकों एवं शर्तों से जुड़े नियम भी स्टैंडिंग ऑर्डर के दायरे में ही आते हैं.

श्रम मामलों के जानकार बताते हैं कि श्रम कानूनों में ‘स्टैंडिंग ऑर्डर’ को इसलिए शामिल किया गया था ताकि कंपनियां एकतरफा, मनमाने और कर्मचारियों के खिलाफ भेदभाव भरे फैसले न ले पाएं. साथ ही औद्योगिक विवाद की स्थिति उत्पन्न न हो और कंपनी मालिक और कर्मियों के बीच (औद्योगिक) संबंध सौहार्दपूर्ण बने रहें. इन लोगों के मुताबिक अब 300 से कम कर्मियों वाली कपनियां ‘स्टैंडिंग ऑर्डर’ की बाध्यता न होने के चलते श्रमिकों के लिये मनमानी सेवा शर्तें रखने में सक्षम हो जाएंगी. एक्सएलआरआई जमशेदपुर में प्रोफेसर और जाने-माने श्रमिक अर्थशास्त्री केआर श्याम सुंदर कहते हैं, ‘स्टैंडिंग ऑर्डर के लिए न्यूनतम श्रमिक की सीमा 100 से बढ़ाकर 300 करने का मतलब साफ़ है कि सरकार मजदूरों को नौकरी पर रखने एवं नौकरी से निकालने के लिए कंपनी मालिकों को खुली छूट दे रही है... अब 300 मजदूरों से कम संख्या वाली कंपनियां कथित दुराचार और आर्थिक कारणों का हवाला देकर आसानी से छंटनी कर सकेंगी.’

2017-18 के वार्षिक औद्योगिक सर्वे के लिहाज से अगर देखें तो 300 से कम श्रमिकों वाली फैक्ट्रियों को स्टैंडिंग ऑर्डर की शर्त से छूट मिलने के बाद इनमें काम करने वाले देश के तकरीबन 44 फीसदी कामगारों को स्टैंडिग ऑर्डर का फायदा नहीं मिल सकेगा.

औद्योगिक संबंध कोड विधेयक को लेकर यह भी कहा जा रहा है कि इसमें किये गए प्रावधानों से अनुबंध यानी कॉन्ट्रैक्ट कर्मचारियों को रखने का चलन बढ़ेगा. प्रोफेसर श्याम सुंदर कहते हैं, ‘अब अनुबंध पर कर्मचारियों को रखे जाने के चलन में बेतहाशा इजाफा होगा. ऐसा इसलिए क्योंकि अब 50 से कम कर्मचारियों को कॉन्ट्रैक्ट पर रखने वाली कंपनियों और ठेकेदारों को ‘कॉन्ट्रैक्ट लेबर रेगुलेशन’ से लगभग मुक्त कर दिया गया है. इससे निर्माण या मैन्यूफैक्चरिंग की कोर गतिविधियों में भी अनुबंध पर कामगारों को रखने की लगभग छूट मिल गई है. बिल के अनुच्छेद 57 (a) (b) और (c) को पढ़ने से यही लगता है.’ प्रोफेसर श्याम सुंदर की माने तो नया कानून कोर गतिविधियों से इतर अपने ज्यादातर कर्मियों को रखने और हटाने की खुली आजादी देता है. साथ ही अब कंपनियां बिना किसी नियम के कॉन्ट्रैक्ट की न्यूनतम और अधिकतम अवधि भी तय कर सकती हैं. सरकार ने नए कानून में उस प्रावधान को भी अब हटा दिया है, जिसके तहत किसी भी मौजूदा कर्मचारी को कॉन्ट्रैक्ट वर्कर में तब्दील करने पर रोक थी.

कुछ अन्य जानकार तो यह तक कहते हैं कि सरकार ने श्रम कानूनों को लचीला बनाने और कंपनियों को फायदा पहुंचाने के मकसद से कानून बनाने के बुनियादी सिद्धांतों को भी ताक पर रख दिया. इनके मुताबिक सरकार को पिछले आंकड़े देखकर ही इसका पता चल जाता कि उसके इस बदलाव से आगे स्थिति कितनी खराब हो सकती है. वार्षिक औद्योगिक सर्वेक्षण के आंकड़े बताते हैं कि 1993-94 में संगठित क्षेत्र की फैक्टरियों के कुल कामगारों में कॉन्ट्रैक्ट पर रखे जाने वाले कामगारों की हिस्सेदारी 13 फीसदी थी. यह आंकड़ा 2016-17 में बढ़ कर 36 फीसदी तक पहुंच गया. यह तब हुआ, जब कर्मचारियों को कॉन्ट्रैक्ट पर रखने की खुली छूट नहीं थी.

पूरी रपट पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें. 


अभय शर्मा, https://satyagrah.scroll.in/article/136064/shram-kanoon-modi-sarkaar


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