कटघरे में जब एक महिला खड़ी हो तब हमारे समाज और मीडिया का सबसे भयावह चेहरा सामने आता है

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published Published on Sep 2, 2020   modified Modified on Sep 3, 2020

-सत्याग्रह,

एक वक्त था जब टीवी न्यूज मीडिया गुनहगारों को सजा दिलाने के लिए सच की लड़ाई भी लड़ता था. याद आता है कि 1999 में हुए जेसिका लाल मर्डर केस में पहले तहलका और फिर एनडीटीवी ने मनु शर्मा को सजा दिलाने के लिए जेसिका की बहन सबरीना लाल का आखिर तक साथ दिया था. 2006 के आखिर में जब दिल्ली हाई कोर्ट ने मनु शर्मा को उम्र कैद की सजा सुनाई थी तब मनु शर्मा के पिता विनोद शर्मा सत्ताधारी पार्टी कांग्रेस में एक ताकतवर नेता थे. ये लड़ाई आज भी सत्ता के खिलाफ सच के खड़े रहने के उदाहरण के तौर पर याद रखी जाती है. कोई मीडिया संस्थान अगर पत्रकारिता की सही पढ़ाई करवाए तो ये पूरी लड़ाई मीडिया की ताकत के ‘सही उपयोग’ की केस स्टडी के तौर पर भी पढ़ाई जा सकती है. ये वो दौर था जब ‘मीडिया ट्रायल’ और ‘मीडिया एक्टिविज्म’ अक्सर दोषी को सजा दिलाने के लिए काम करते थे और इनकी बुनियाद ठोस पत्रकारिता हुआ करती थी. आज की तरह चौकीदार से लेकर डिलीवरी बॉय तक के मुंह में माइक ठूंसने वाली पत्रकारिता नहीं.

फिर जब मीडिया का चरित्र बदला और दर्शकों के मुंह से सनसनीखेज टेबलॉयड न्यूज का स्वाद लगा तो मीडिया ट्रायल और मीडिया एक्टिविज्म ने उस दु:स्वप्न का रूप ले लिया जो घोर महिला विरोधी बनता चला गया. वो सत्ता से सवाल करने में डरने लगा, कॉन्सपिरेसी थ्योरीज से प्यार करने लगा, अतिनाटकीयता और आक्रामकता उसके प्रमुख हथियार हो गए, और पत्रकारिता के सिद्धांत अपने काम की बुनियाद बनाने की जगह आम नागरिकों को खोज-खोजकर वो उनके मुंह में माइक और शब्द ठूंसने लगा. इसका पहला शिकार बने आरुषि तलवार मर्डर केस में राजेश और नूपुर तलवार और अब तकरीबन वही मीडिया सर्कस, उसी द्वेष और भयावहता के साथ, रिया चक्रवर्ती को अपना शिकार बना रहा है.

हाल ही में अपना पक्ष रखने के लिए रिया चक्रवर्ती ने भी कुछ इंटरव्यूज दिए. हमारा कानून कहता है कि जब तक आरोप सिद्ध न हो जाए तब तक हर किसी को अपना पक्ष रखने का हक है. तो फिर रिया चक्रवर्ती को ये हक क्यों न दिया जाए? इस मीडिया ट्रायल में, उनके अलावा लगभग सभी ने अपना-अपना पक्ष पिछले कुछ महीनों से टीवी चैनलों के समक्ष रखा है, तो उन्हें ये स्पेस क्यों नहीं मिलना चाहिए? सोशल मीडिया पर कइयों ने कहा कि उनके ये इंटरव्यूज स्क्रिप्टिड थे. कइयों ने कहा कि मुश्किल सवाल नहीं पूछे गए. कइयों ने कहा कि हर इंटरव्यू में शब्दश: एक-से जवाब दिए गए. कइयों ने कहा कि नाटकीयता अधिक थी क्योंकि ‘सुशांत मेरे सपने में आए और अपनी बात रखने को कहा’ जैसी हास्यास्पद बातें रिया ने बोलीं. लेकिन, जो कायदे की बातें रिया ने बोलीं वो ‘तकरीबन’ हर उस सवाल का जवाब देने वाली थीं जो इतने दिनों से लगातार मीडिया ट्रायल का हिस्सा बनते रहे हैं.

एक से लेकर पौने दो घंटे के इंटरव्यूज देना आसान नहीं होता, वो भी तब जब आपसे हर वो संभव सवाल पूछा जाए जो इस केस से जुड़ा हो. एनडीटीवी 24*7 को दिया इंटरव्यू तो एक घंटे का होने के अलावा लाइव भी था और इसमें रिया ने कुछ उन सवालों के जवाब भी दिए जो राजदीप सरदेसाई को पहले दिए इंटरव्यू के बाद सोशल मीडिया पर लगातार पूछे जा रहे थे. जैसे हवाई जहाज में ट्रैवल करने में सुशांत को लगने वाले डर से जुड़ा काउंटर-सवाल. बाद में चलकर 2015 का एक पुराना वीडियो भी सामने आया जिसमें सुशांत क्लॉस्ट्रोफोबिक होने की बात खुद स्वीकार रहे हैं.

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शुभम उपाध्याय, https://satyagrah.scroll.in/article/136033/sushant-singh-case-rhea-chakraborty-media-trail-vishleshan


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