कुपोषण से जूझते राजस्थान में क्यों उम्मीद की किरण है सुपोषण वाटिका?

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published Published on Aug 27, 2020   modified Modified on Aug 27, 2020

-गांव कनेक्शन,

कुपोषण राजस्थान ही नहीं पूरे देश के लिए गंभीर समस्या है। इस मामले में राजस्थान असम और बिहार के बाद तीसरे नंबर पर है। नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे-4 के अनुसार प्रदेश में 38.4% बच्चों का वजन औसत से कम है। 23.4 फीसदी बच्चे शारीरिक रूप से कमजोर, 8.7% बच्चे अति कमजोर और 40.8 फीसदी बच्चे अविकसित हैं। 2011 जनगणना के अनुसार प्रदेश में एक करोड़ से ज्यादा बच्चे 0-6 साल की उम्र के हैं। राजस्थान में पोषण की कमी से जूझते हजारों बच्चों का ये दर्द को सिर्फ आंकड़ों से महसूस नहीं किया जा सकता। ये वो पीड़ा और एक ऐसा कुचक्र है जिसमें वे पीढ़ियों से पिस रहे हैं।

कुपोषण से पीड़ित लाखों नौनिहालों के इलाज के लिए भारत सरकार ने 2011 में जिला अस्पताल और मेडिकल कॉलेज स्तर पर कुपोषण निवारण केन्द्र (एमटीसी) स्थापित किए। बाद में इन एमटीसी को सीएचसी (सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र) स्तर तक ले जाया गया। ऐसे बच्चों को गांवों से सीएचसी तक लाने की जिम्मेदारी आशा और आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को दी गई, लेकिन इस काम में ये कार्यकर्ता उम्मीद की मुताबिक प्रदर्शन नहीं कर पाईं। नतीजा यह हुआ कि छोटे-छोटे गांवों के कुपोषित बच्चे इन एमटीसी तक नहीं पहुंच पा रहे। इसके अलावा एक समस्या और सामने आई कि जो बच्चे अपना इलाज करा वापस आते हैं उन्हें अपने घरों में लगातार संतुलित आहार नहीं मिल पाता। इसीलिए वे वापस कुपोषण की चपेट में आ जाते हैं।

इस तरह गरीबी के कारण कुपोषण और कुपोषण के कारण गरीबी का कुचक्र चलता रहता है। इस कुचक्र को तोड़ने की एक कोशिश राजस्थान के उदयपुर जिले ने बीते साल नवंबर महीने से की है। उदयपुर जिला प्रशासन ने एमटीसी को ब्लॉक (सीएचसी) से हटाकर ग्राम पंचायत स्तर पर खोलने की योजना बनाई और गांवों में विशेष कैंप लगाए। उदयपुर ऐसा करने वाला राजस्थान का पहला जिला है। उदयपुर की तत्कालीन कलेक्टर आनंदी बताती हैं, "एमटीसी को पंचायत स्तर पर इसीलिए लाया गया क्योंकि ब्लॉक और जिला लेवल पर बेहद कम संख्या में बच्चे पहुंच पा रहे थे। उदयपुर जिला अस्पताल के एमटीसी में 2014-15 से 2019-20 तक कुल 5976 बच्चे भर्ती हुए। इनमें से सिर्फ 152 बच्चे (2.74%) आशा और आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं द्वारा लाए गए थे। बाकी बच्चे अन्य बीमारियों के कारण अस्पताल तक पहुंचे थे।

वे आगे बताती हैं, "आंकड़ों से स्पष्ट हो गया कि कुपोषण निवारण केन्द्र (एमटीसी) अपने लक्ष्यों को पूरा नहीं कर पा रहे हैं। साथ ही आंगनबाड़ी और आशा कार्यकर्ता भी अपनी जिम्मेदारी नहीं निभा पाई हैं। किसी अन्य बीमारी के लिए जिला अस्पताल या सीएचसी आ रहे बच्चों में मेडिकल टेस्ट के दौरान पोषण की कमी के लक्षण सामने आते हैं। इसके बाद डॉक्टर ऐसे बच्चों के कुपोषण का इलाज पहले करते हैं ताकि वे जिस बीमारी के लिए भर्ती हुए हैं, वो ठीक की जा सके। जबकि मुख्य समस्या बच्चे का कुपोषित होना ही है।"

पूरी रपट पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.


माधव शर्मा, https://www.gaonconnection.com/desh/why-is-suposhan-vatika-a-ray-of-hope-in-rajasthan-struggling-with-malnutrition-47993


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